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नेतृत्व तैयार करने में जुटा संघ

पहले हरियाणा में हार को जीत में बदल कर तीसरी बार सरकार बनाने और फिर महाराष्ट्र में आशा के विपरीत एकतरफा तूफानी बहुमत हासिल करके भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए ने लोकसभा चुनावों में मिले खासे झटके के सदमे को नए हौसले में बदल दिया है। हालांकि, इसी दौर में जम्मू कश्मीर और झारखंड में विपक्षी इंडिया गठबंधन की भी जीत हुई है, लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र की जीत के जश्न और शोर में इन दोनों राज्यों में भाजपा की नाकामयाबी की चर्चा दब गई है। भाजपा की इस जीत का श्रेय यूं तो हर बार की तरह पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति को दे रही है, लेकिन दूसरी तरफ इन दोनों राज्यों की सफलता को भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने हजारों स्वयंसेवकों की मेहनत का नतीजा बताया है। आमतौर पर संघ पर्दे के पीछे रहकर ही काम करता है और चुनावी सफलता का श्रेय संघ कभी सीधे नहीं लेता है, लेकिन पहली बार उसने खुलकर इसका श्रेय अपने स्वयंसेवकों को दिया है। इसके साथ ही संघ अब मोदी युग के बाद भाजपा के नेतृत्व को गढ़ने में जुट गया है।संघ के इस रुख के कई संकेत हैं। पहला ये कि लोकसभा चुनावों में जब भाजपा के 370 और एनडीए के चार सौ पार के नारे की हवा निकली और भाजपा बमुश्किल 240 सीटें ही जीत पाई और तीसरी बार उसे अपनी सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर होना पड़ा है। तब संघ की तरफ से यह संदेश दिया गया कि ऐसा इसलिए हुआ कि लोकसभा चुनावों में आरएसएस के स्वयंसेवक उदासीन हो गए और संघ ने इन चुनावों को पूरी तरह मोदी शाह और भाजपा के भरोसे छोड़ दिया था।नतीजा ये कि भाजपा को अपने बलबूते बहुमत के आंकड़े के भी लाले पड़ गए।यह एक तरह से चुनावों के बीच में एक अखबार को दिए गए इंटरव्यू में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के बयान कि भाजपा अब अपने पैरों पर खडी हो गई है और उसे अब संघ के सहारे की जरूरत नहीं है,का संघ की तरफ से दिया गया जवाब भी माना जा सकता है।

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