नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से यातायात नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों को समाप्त किए जाने पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। न्यायमूर्ति जेबी पार्डीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत गैर-समझौता योग्य अपराध, अनिवार्य जेल की सजा वाले अपराध और बार-बार किए गए अपराध समाप्त नहीं माने जाने चाहिए। ऐसे मामलों में मुकदमे दोबारा शुरू किए जाने की स्थिति स्पष्ट करने के लिए सरकार से अध्यादेश लाने को कहा गया है।
मामला उत्तर प्रदेश आपराधिक कानून (अपराधों का समझौता और मुकदमों की समाप्ति) 2023 की वैधानिकता से जुड़ा है। इस कानून के तहत 31 दिसंबर 2021 तक मोटर वाहन अधिनियम के अंतर्गत लंबित कुछ अपराधों को समाप्त किया गया था। मामले में सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार ने 2026 में अध्यादेश जारी कर तीन श्रेणियों के अपराधों को समाप्ति के दायरे से बाहर करने का प्रावधान किया है।
हालांकि, पीठ ने सवाल उठाया कि जिन मामलों को पहले ही समाप्त माना जा चुका है, उनका क्या होगा। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से बताया गया कि ऐसे मामलों की पहचान की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और राज्य के 75 जिलों में से 72 जिलों से जानकारी प्राप्त हो चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि सरकार एक और अध्यादेश जारी कर स्पष्ट करे कि पहले समाप्त माने गए गंभीर अपराधों में मुकदमे फिर से शुरू किए जाएंगे। अदालत ने यह भी कहा कि अध्यादेश में स्पष्ट होना चाहिए कि इन श्रेणियों के अपराधों को कभी समाप्त नहीं माना गया।
मामले में कानून की संवैधानिक वैधता का सवाल भी लंबित है। न्यायालय ने सुनवाई जारी रखते हुए सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
सड़क सुरक्षा से जुड़े अन्य मुद्दे पर अदालत ने व्यावसायिक वाहनों में स्पीड गवर्नर और वाहन ट्रैकिंग उपकरण लगाने के संबंध में केंद्र और राज्यों से जवाब भी मांगा। दिल्ली में पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए फुटओवर ब्रिज, स्पीड ब्रेकर और रंबल स्ट्रिप जैसे उपायों पर भी चर्चा हुई।





