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ढाका यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीरों पर विवाद, छात्रों ने फाड़े पोस्टर; जांच कमेटी गठित

ढाका। बांग्लादेश की प्रतिष्ठित ढाका यूनिवर्सिटी में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीरें लगाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यूनिवर्सिटी के पुनर्गठित छात्र संघ संग्रहालय में जिन्ना से जुड़ी तस्वीरें और ऐतिहासिक सामग्री प्रदर्शित किए जाने के बाद कई छात्र संगठनों ने इसका विरोध किया। एक छात्र ने विरोध में जिन्ना की तस्वीरें फाड़ दीं। मामले को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है।

विवाद विश्वविद्यालय के ढाका यूनिवर्सिटी सेंट्रल स्टूडेंट्स यूनियन (DUCSU) के संग्रहालय के दोबारा खुलने के बाद शुरू हुआ। यहां जिन्ना की कई तस्वीरों के साथ उपमहाद्वीप के राजनीतिक इतिहास से जुड़ी तस्वीरें और अखबारों की कतरनें प्रदर्शित की गई थीं। इनमें वर्ष 1948 में ढाका के तत्कालीन रेसकोर्स मैदान में जिन्ना के भाषण की तस्वीर भी शामिल थी, जिसमें उन्होंने उर्दू को पाकिस्तान की राज्य भाषा बनाने की बात कही थी।

तस्वीरें सामने आने के बाद छात्र संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया। सोमवार को उर्दू विभाग के एक छात्र ने संग्रहालय में पहुंचकर जिन्ना की तस्वीरें फाड़ दीं। विरोध करने वाले छात्रों ने जिन्ना की भाषा नीति और 1952 के भाषा आंदोलन तथा 1971 के मुक्ति संग्राम के ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला दिया। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी से जुड़े छात्र संगठन ने भी तस्वीरों के प्रदर्शन की आलोचना करते हुए उन्हें हटाने की मांग की।

विरोध के दौरान वामपंथी छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं ने जमात-ए-इस्लामी के पूर्व नेता गुलाम आजम से जुड़ी एक विवादित तस्वीर भी संग्रहालय में लगा दी। इस कदम को जिन्ना की तस्वीरों के विरोध के तौर पर बताया गया। मामले ने विश्वविद्यालय परिसर में राजनीतिक इतिहास और 1971 के मुक्ति संग्राम की विरासत को लेकर बहस को और तेज कर दिया।

मामले को गंभीरता से लेते हुए ढाका यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की है। समिति यह जांच करेगी कि प्रशासनिक अनुमति के बिना तस्वीरें क्यों और किसके निर्देश पर प्रदर्शित की गईं। विश्वविद्यालय ने संग्रहालय में संवेदनशील ऐतिहासिक सामग्री के प्रदर्शन को लेकर प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालन करने पर भी जोर दिया है।

DUCSU नेतृत्व ने तस्वीरों के प्रदर्शन का बचाव करते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य जिन्ना का महिमामंडन करना नहीं, बल्कि इतिहास के संदर्भ को दस्तावेजों के माध्यम से प्रस्तुत करना था। विवाद के बीच विश्वविद्यालय में बांग्लादेश के इतिहास और राजनीतिक विरासत को किस तरह प्रस्तुत किया जाए, इस पर बहस जारी है।

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