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मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की तैयारी में विपक्ष; ‘इंडिया’ गठबंधन लाएगा अविश्वास प्रस्ताव

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम काटे जाने के विवाद (SIR विवाद) को लेकर ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सोमवार को मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में हुई विपक्षी दलों की बैठक में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के प्रस्ताव पर सहमति बनी है कि ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग जैसी प्रक्रिया (Removal Motion) शुरू की जाए।

विवाद की जड़: बंगाल में ‘वोट चोरी’ का आरोप

विपक्ष द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को निशाने पर लेने के पीछे कई गंभीर कारण बताए जा रहे हैं:

  • वोटर लिस्ट में गड़बड़ी: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आरोप है कि ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के नाम पर लाखों वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं।
  • बदसलूकी का आरोप: बंगाल की मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि कोलकाता में बैठक के दौरान ज्ञानेश कुमार ने उनके साथ चिल्लाकर बात की और महिलाओं का अपमान किया।
  • पक्षपातपूर्ण रवैया: विपक्ष का दावा है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से कार्य करने के बजाय सत्ता पक्ष के इशारे पर काम कर रहा है।

CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया (Article 324-5)

भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत उन्हें उसी तरह हटाया जा सकता है जैसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को। जानिए इसकी पूरी कानूनी प्रक्रिया:

1. नोटिस और हस्ताक्षर की आवश्यकता

प्रस्ताव लाने के लिए सांसदों का समर्थन अनिवार्य है:

  • लोकसभा में: कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस स्पीकर को देना होगा।
  • राज्यसभा में: कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस सभापति को देना होगा।

2. आरोपों की जांच

एक बार नोटिस स्वीकार होने के बाद, संबंधित सदन के प्रमुख (स्पीकर या सभापति) एक विशेष समिति का गठन करेंगे। यह समिति मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे ‘कदाचार’ (Misbehaviour) या ‘अक्षमता’ (Incapacity) के आरोपों की जांच करेगी।

3. सदन में चर्चा और विशेष बहुमत

यदि समिति आरोपों को सही पाती है, तो प्रस्ताव पर सदन में चर्चा और मतदान होगा। इसे पारित करने के लिए ‘विशेष बहुमत’ (Special Majority) की आवश्यकता होती है:

  • सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत।
  • उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) बहुमत।
  • यह प्रक्रिया दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में अलग-अलग पूरी होनी चाहिए।

4. राष्ट्रपति की अंतिम मुहर

दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद, इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति के आदेश के बाद ही मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से मुक्त माना जाता है।

संसदीय गणित: क्या सफल होगा विपक्ष?

विशेषज्ञों का मानना है कि विपक्ष के पास नोटिस देने के लिए आवश्यक संख्या (100/50) तो मौजूद है, लेकिन इसे पारित कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं है। ऐसे में इस प्रस्ताव का उद्देश्य कानूनी से ज्यादा राजनीतिक है, ताकि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर बहस छेड़ी जा सके और सरकार पर दबाव बनाया जा सके।

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