तेहरान/ब्रुसेल्स: पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य और कूटनीतिक संकट के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का रुख स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि ईरान शांति का पक्षधर है, लेकिन अमेरिका या किसी भी अन्य शक्ति द्वारा दबाव बनाकर थोपी गई शर्तें उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं। दूसरी ओर, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर यूरोपीय देशों ने अमेरिका से इतर एक स्वतंत्र रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।
राष्ट्रपति पेजेशकियन का मानवता और कानून पर सवाल
ईरानी समाचार एजेंसी के माध्यम से जारी बयान में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिका और उसके सहयोगियों पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा:
- शांति की पहल: ईरान युद्ध का इच्छुक नहीं है और समस्याओं का समाधान केवल ‘डायलॉग’ (वार्ता) के माध्यम से चाहता है।
- अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई: राष्ट्रपति ने वैश्विक समुदाय से सवाल किया कि आखिर किस कानून के तहत आम नागरिकों, मासूम बच्चों, स्कूलों और अस्पतालों को युद्ध की विभीषण झेलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी सिद्धांतों का घोर उल्लंघन बताया।
- सम्मान के साथ समझौता: उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान बातचीत के लिए हमेशा तैयार है, लेकिन यदि अमेरिका इसे कमजोरी समझकर दबाव बनाने की कोशिश करेगा, तो वह कभी सफल नहीं होगा।
होर्मुज पर यूरोप की नई स्वतंत्र रणनीति
होर्मुज जलडमरूमध्य, जहाँ से दुनिया का एक बड़ा तेल व्यापार संचालित होता है, वहां सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यूरोपीय देशों ने एक नया मार्ग चुना है। हालिया तनाव के बाद यूरोपीय देश अब इस क्षेत्र में मिशन चलाने के लिए अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
- बिना अमेरिका के गश्त: यूरोपीय संघ के प्रमुख देश एक ऐसी योजना तैयार कर रहे हैं जिसके तहत वे अपने नौसैनिक जहाजों को बिना अमेरिकी दखल के होर्मुज में तैनात करेंगे।
- उद्देश्य: इस योजना का मुख्य लक्ष्य समुद्री व्यापारिक मार्गों पर वैश्विक शिपिंग कंपनियों का भरोसा बहाल करना और ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करना है।
बदलते कूटनीतिक समीकरण
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान और यूरोप का यह नया कदम दर्शाता है कि पश्चिम एशिया का संकट अब केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रह गया है। जहाँ ईरान इसे अपनी संप्रभुता और मानवता का मुद्दा बना रहा है, वहीं यूरोप अब अमेरिका की ‘एकतरफा’ नीतियों से हटकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए स्वतंत्र कूटनीति अपना रहा है।




