नई दिल्ली। आईडीबीआई बैंक के निजीकरण को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के आरोपों पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि जब नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई थी, तब आईडीबीआई बैंक की हालत बेहद खराब थी। कांग्रेस सरकारों के दौरान राजनीतिक दबाव में बड़े उद्योगपतियों को कर्ज दिए गए, जो बाद में एनपीए में बदल गए और बैंक को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
वित्त मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए वीडियोकॉन, विंसम, एबीजी शिपयार्ड और किंगफिशर जैसी कंपनियों का नाम लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कंपनियों को दिए गए कर्ज डूबने से बैंक की वित्तीय स्थिति कमजोर हुई थी।
25 हजार करोड़ से अधिक की पूंजी से बैंक को उबारा
सीतारमण ने कहा कि एनडीए सरकार ने पेशेवर प्रबंधन, समझदारी भरे फैसलों और 25 हजार करोड़ रुपये से अधिक की पुनर्पूंजीकरण राशि के जरिए आईडीबीआई बैंक को संकट से बाहर निकाला। आज बैंक मुनाफे की स्थिति में है और विकास के अगले चरण के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि बैंक के रणनीतिक पुनर्गठन की प्रक्रिया में सभी निर्धारित नियमों का पालन किया गया है।
राहुल गांधी ने उठाए थे निजीकरण पर सवाल
दरअसल, राहुल गांधी ने केंद्र सरकार के आईडीबीआई बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने के फैसले पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस के शासनकाल में बैंक बनाए गए, जबकि मोदी सरकार के समय उन्हें बेचा जा रहा है। उन्होंने बैंक कर्मचारियों के हितों, आरक्षण और सेवा शर्तों को लेकर भी चिंता जताई थी।
टाटा समूह को लेकर भी हुआ था विवाद
आईडीबीआई बैंक के मुद्दे से पहले राहुल गांधी और निर्मला सीतारमण के बीच टाटा समूह को लेकर भी जुबानी जंग हुई थी। राहुल गांधी ने टाटा समूह को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए थे। इसके जवाब में वित्त मंत्री ने कहा था कि हर व्यावसायिक और कानूनी मामले का राजनीतिकरण करना उचित नहीं है।
आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी बिक्री को लेकर दोनों नेताओं के बीच जारी बयानबाजी से राजनीतिक माहौल गरमा गया है।





