देहरादून। ब्रिक्स सम्मेलन में हुए समझौतों और नई दिल्ली घोषणापत्र से उत्तराखंड समेत हिमालयी राज्यों के विकास और जलवायु अनुकूलन के लिए नई संभावनाएं सामने आई हैं। पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, आपदा प्रबंधन और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
नई दिल्ली घोषणापत्र में आपदा प्रबंधन के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली और डेटा साझा करने को बढ़ावा देने पर सहमति बनी है। हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, बादल फटने, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को देखते हुए ऐसी व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जा रही है। साझा तकनीक और समय पर सूचना मिलने से संवेदनशील क्षेत्रों में राहत एवं बचाव की तैयारियों को मजबूत किया जा सकता है।
हिमनदों की निगरानी में सहयोग
उत्तराखंड के जोशीमठ जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए रूस और चीन के हिमनद निगरानी से जुड़े अनुभव उपयोगी हो सकते हैं। बेहतर तकनीक और वैज्ञानिक सहयोग से हिमालयी क्षेत्रों में भू-परिवर्तन तथा जलवायु संबंधी जोखिमों की निगरानी को मजबूत करने की संभावनाएं हैं। घोषणापत्र में जलवायु और आपदा जोखिमों के प्रति बुनियादी ढांचे को अधिक लचीला बनाने पर भी जोर दिया गया है।
मंडुवा और झंगोरा को मिल सकता है बाजार
ब्रिक्स देशों के बीच कृषि क्षेत्र में सहयोग और अनाज के आदान-प्रदान के लिए उत्कृष्टता केंद्र विकसित करने की दिशा में भी सहमति बनी है। इससे उत्तराखंड के पारंपरिक कृषि उत्पादों जैसे मंडुवा, झंगोरा और राजमा को बड़े बाजार तक पहुंचाने के अवसर बढ़ सकते हैं। इससे स्थानीय किसानों और उत्पादकों को लाभ मिलने की संभावना है।
घोषणापत्र में जलवायु अनुकूलन के लिए स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है। हिमालयी राज्यों में स्थानीय समुदायों के अनुभवों को आपदा प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन की योजनाओं में उपयोग किया जा सकता है।
इन समझौतों से उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों के लिए पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास, आपदा प्रबंधन, कृषि और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है।





