Saturday, March 7, 2026

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‘हम एकत्व को नहीं पहचानते, इसीलिए दुनिया झेल रही आक्रमण’: जैसलमेर में बोले मोहन भागवत; सनातन और एकता पर दिया जोर

जैसलमेर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने राजस्थान के जैसलमेर में आयोजित एक विशाल कार्यक्रम के दौरान वैश्विक अशांति और भारत की सांस्कृतिक एकता पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में हो रहे युद्धों और आक्रमणों का मूल कारण मानवीय एकता और ‘एकत्व’ के भाव की कमी को बताया। भागवत ने कहा कि जब तक समाज अपनी साझा जड़ों और एकता को नहीं पहचानेगा, तब तक दुनिया में संघर्षों का सिलसिला थमता नजर नहीं आएगा।

एकत्व की पहचान ही शांति का मार्ग

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में ‘एकत्व’ (Oneness) की अवधारणा को विस्तार से समझाया:

  • विभाजन का दुष्परिणाम: उन्होंने तर्क दिया कि हम अक्सर बाहरी भेदों (जैसे भाषा, जाति, और क्षेत्र) में उलझ जाते हैं और उस मूल एकता को भूल जाते हैं जो सबको जोड़ती है। इसी अज्ञानता का लाभ उठाकर दुनिया में आक्रमण और शोषण की प्रवृत्तियां जन्म लेती हैं।
  • सनातन दृष्टि: सरसंघचालक ने कहा कि भारत की सनातन संस्कृति हमेशा से ही ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) में विश्वास रखती है। यदि पूरी दुनिया इस विचार को अपना ले, तो संघर्ष स्वतः ही समाप्त हो जाएंगे।

वैश्विक संघर्षों पर कड़ा संदेश

मिडिल ईस्ट और अन्य क्षेत्रों में जारी तनाव के बीच भागवत का यह बयान काफी प्रासंगिक माना जा रहा है:

  1. आक्रमण की मानसिकता: उन्होंने कहा कि आज दुनिया में ‘स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन’ समझने की जो होड़ लगी है, वही युद्धों का मुख्य कारण है।
  2. भारत की भूमिका: भागवत ने रेखांकित किया कि भारत एक ऐसी शक्ति के रूप में उभर रहा है जो दुनिया को विनाश से बचाकर शांति और सद्भाव का मार्ग दिखा सकती है।
  3. आत्मबोध की आवश्यकता: उन्होंने समाज से अपील की कि वे अपने गौरवशाली इतिहास और पूर्वजों के मूल्यों को पहचानें, क्योंकि एक सशक्त और एकजुट समाज ही किसी भी बाहरी आक्रमण का सामना कर सकता है।

जैसलमेर की सीमावर्ती महत्ता पर चर्चा

सीमावर्ती जिले जैसलमेर के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा:

  • सजग प्रहरी: उन्होंने सीमा पर रहने वाले नागरिकों को देश का ‘प्रथम सुरक्षा घेरा’ बताया और उनकी राष्ट्रभक्ति की सराहना की।
  • संगठन का कार्य: आरएसएस प्रमुख ने जोर दिया कि संघ का कार्य केवल व्यक्ति निर्माण नहीं, बल्कि समाज के भीतर उस एकता के भाव को जगाना है जो राष्ट्र को अजेय बनाती है।

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