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‘सुधार के नाम पर धर्म को खोखला करना स्वीकार्य नहीं’: सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली: केरल के सुप्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। मामले की सुनवाई कर रही नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने स्पष्ट किया कि सामाजिक कल्याण या सुधार के नाम पर किसी भी धर्म की मौलिक पहचान को खत्म नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि सुधार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच एक उचित संतुलन होना अनिवार्य है।

धार्मिक प्रथाओं और सुधार के बीच संतुलन

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की पीठ ने संवैधानिक सवालों पर दलीलें सुनते हुए कहा कि सामाजिक सुधारों का उद्देश्य धर्म को ‘खोखला’ करना नहीं होना चाहिए। अदालत की मुख्य बातें निम्नलिखित रहीं:

  • अनिवार्य प्रथाओं का संरक्षण: बेंच ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म से उसकी वे प्रथाएं नहीं छीनी जा सकतीं, जो उस धर्म का आधार या अनिवार्य हिस्सा हैं।
  • आस्था का सम्मान: शीर्ष अदालत ने स्वीकार किया कि लाखों लोगों की गहरी मान्यताओं और आस्था को गलत ठहराना या उनमें बदलाव करना न्यायपालिका के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में से एक है।

2018 का ऐतिहासिक फैसला और वर्तमान बहस

यह कानूनी विमर्श उस पृष्ठभूमि में हो रहा है जब साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी।

  • पुरानी प्रथा: पूर्व में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं (रजस्वला आयु वर्ग) के प्रवेश पर प्रतिबंध था।
  • पिछला तर्क: 2018 के फैसले में अदालत ने इस पाबंदी को ‘छुआछूत’ के समान बताते हुए कहा था कि यह धर्म की कोई अनिवार्य प्रथा नहीं है। हालांकि, इस फैसले के बाद व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिसके कारण मामला पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच के पास भेजा गया।

संवैधानिक सवालों पर टिकी नजर

वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच इस बात पर विचार कर रही है कि क्या न्यायपालिका को किसी धर्म की ‘अनिवार्य प्रथाओं’ को तय करने का अधिकार है और क्या अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता, समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) से ऊपर है।

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