वाशिंगटन/नई दिल्ली: वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की चिंताओं को बढ़ाते हुए अमेरिका ने एक बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका अब रूस और ईरान से कच्चे तेल की खरीद पर दी जाने वाली ‘छूट अवधि’ (Waiver Period) को आगे नहीं बढ़ाएगा। इस निर्णय का सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ेगा, जो पिछले कुछ समय से रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर रहे थे।
सामान्य लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं करेगा अमेरिका
बुधवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बाइडेन प्रशासन के बाद अब ट्रंप प्रशासन के कड़े रुख की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि अमेरिका रूसी और ईरानी तेल की आपूर्ति के लिए जारी ‘सामान्य लाइसेंस’ का नवीनीकरण (Renewal) नहीं करेगा।
- सीमित आपूर्ति का अंत: वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि 11 मार्च से पहले जो तेल समुद्री मार्ग में (ट्रांजिट में) था, केवल उसी के उपयोग की अनुमति थी, और वह कोटा अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
- कोई नई छूट नहीं: अब किसी भी नए सौदे के लिए अमेरिका प्रतिबंधों में ढील देने के पक्ष में नहीं है।
ट्रंप प्रशासन की नई ऊर्जा नीति के संकेत
इस कदम से यह साफ हो गया है कि नवनिर्वाचित ट्रंप प्रशासन अब प्रतिबंधों में छूट का रास्ता अपनाकर वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ाने या ऊर्जा की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं करेगा। अमेरिका का यह फैसला संकेत देता है कि वह रूस और ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाए रखने के लिए प्रतिबंधों को और अधिक सख्ती से लागू करने की योजना बना रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और भारत की मुश्किलें
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में पहले से ही नाकाबंदी और सुरक्षा चुनौतियों के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है।
- सस्ते तेल का विकल्प खत्म: यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा था, क्योंकि वह अंतरराष्ट्रीय कीमतों से काफी कम दाम पर तेल उपलब्ध करा रहा था।
- महंगाई का खतरा: अमेरिकी लाइसेंस का नवीनीकरण न होने से भारत के लिए अब रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदना कानूनी और कूटनीतिक रूप से जटिल हो जाएगा, जिससे घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों में बढ़ोत्तरी का खतरा मंडराने लगा है।




