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शिवसेना विवाद में शिंदे गुट की बड़ी दलील, चुनाव आयोग को नया पार्टी संविधान सौंपने का नहीं मिला सबूत

नई दिल्ली। महाराष्ट्र में शिवसेना पर अधिकार और चुनाव चिह्न को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट में अहम चरण में पहुंच गई है। बुधवार को सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट ने चुनाव आयोग के उस फैसले का बचाव किया, जिसमें शिंदे गुट को वास्तविक शिवसेना मानते हुए ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।

शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन.के. कौल ने सुप्रीम कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में वर्ष 2011 के पार्टी संविधान के अलावा किसी अन्य संशोधित संविधान को जमा किए जाने का कोई प्रमाण नहीं है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2011 में चुनाव आयोग की अपेक्षाओं के अनुरूप तैयार किया गया पार्टी संविधान ही रिकॉर्ड में उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेज है। शिंदे गुट ने इसी आधार पर चुनाव आयोग के फैसले को सही ठहराने की कोशिश की।

आंतरिक लोकतंत्र का मुद्दा

सुनवाई के दौरान राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र के महत्व पर भी जोर दिया गया। शिंदे गुट की ओर से कहा गया कि राजनीतिक दल लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं और उनके भीतर भी पारदर्शिता तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन होना जरूरी है।

दलील में यह भी कहा गया कि पार्टी में समय पर आंतरिक चुनाव नहीं होने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किए जाने से राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक दावों पर सवाल उठ सकते हैं।

अयोग्यता के मामलों पर भी दलील

सुनवाई के दौरान विरोधी पक्ष की ओर से यह सवाल उठाया गया कि क्या चुनाव आयोग को विधायकों की अयोग्यता से संबंधित मामलों में विधानसभा अध्यक्ष के फैसले का इंतजार करना चाहिए था।

इस पर शिंदे गुट ने कहा कि अयोग्यता की याचिका दाखिल होना और उस पर अंतिम निर्णय होना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। जब तक किसी विधायक के खिलाफ अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक उसे अपने वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने का अधिकार रहता है।

सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है। अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं और आगे की कार्यवाही जारी रहेगी। अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा।

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