नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिकन डिक्लेरेशन ऑफ फ्रीडम इन स्पेस’ घोषणा ने अंतरिक्ष की दुनिया में नई भू-राजनीतिक बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका अंतरिक्ष की खोज, विकास, उपयोग और वहां स्थायी उपस्थिति स्थापित करने में दुनिया का नेतृत्व करेगा। उन्होंने वर्ष 2028 तक चंद्रमा पर अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों की वापसी और वहां स्थायी अमेरिकी मौजूदगी की नींव रखने का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही मंगल ग्रह पर मानव मिशन भेजने की महत्वाकांक्षा भी दोहराई है।
अंतरिक्ष में अमेरिकी वर्चस्व की तैयारी
ट्रंप प्रशासन ने अंतरिक्ष को आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए अमेरिकी नेतृत्व को मजबूत करने पर जोर दिया है। हालांकि, इस घोषणा ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि भविष्य में चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों पर गतिविधियों के नियम कौन तय करेगा। क्या अंतरिक्ष पूरी मानवता की साझा संपत्ति बना रहेगा या देश अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर वहां प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करेंगे?
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरिक्ष गतिविधियों को लेकर दुनिया दो प्रमुख समूहों में बंटती दिखाई दे रही है। एक ओर अमेरिका के नेतृत्व वाला आर्टेमिस समूह है, तो दूसरी ओर चीन और रूस का अंतरराष्ट्रीय चंद्र अनुसंधान स्टेशन (आइएलआरएस) कार्यक्रम है। दोनों समूह चंद्रमा पर अपनी तकनीकी और रणनीतिक क्षमता बढ़ाने में जुटे हैं।
भारत के सामने रणनीतिक चुनौती
भारत के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है। भारत ने जून 2023 में अमेरिका के नेतृत्व वाले आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। वहीं, 1979 के मून एग्रीमेंट पर भी हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन अभी इसका अनुमोदन नहीं किया है।
भारत का अपना अंतरिक्ष विजन 2047 है। इसके तहत वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने और 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को चंद्रमा पर उतारने का लक्ष्य रखा गया है। अगस्त 2026 में नासा ने इसरो को अपने मून बेस कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिका और चीन जैसे अंतरिक्ष शक्तियों के साथ सहयोग करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी होगी। आने वाले वर्षों में चंद्रमा पर संसाधनों के उपयोग और अंतरिक्ष के नियम तय करने में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।





