नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित होगा। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, वैश्विक व्यापार तनाव और बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच होने वाला यह सम्मेलन ब्रिक्स के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत की अध्यक्षता में सम्मेलन का जोर विकास, आर्थिक सहयोग और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों पर रहेगा।
भारत ने इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता के लिए ‘Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability’ की थीम तय की है। इसके तहत खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन, महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं, नवाचार, हरित ऊर्जा और डिजिटल सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। भारत वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की भूमिका मजबूत करने पर भी जोर दे रहा है।
हालांकि सम्मेलन के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच मतभेद उभर आए हैं। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की अलग-अलग स्थितियां साझा घोषणापत्र पर सहमति बनाने में मुश्किल पैदा कर रही हैं। मई में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भी सदस्य देशों के बीच मतभेदों के कारण संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका था।
ब्रिक्स के विस्तार से समूह का आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ा है, लेकिन इसके साथ सदस्य देशों के हितों में विविधता भी बढ़ी है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह समूह को किसी एक देश या गुट के विरोध के मंच के बजाय वैश्विक दक्षिण की आवाज और व्यावहारिक सहयोग के प्रभावी मंच के रूप में आगे बढ़ाए।
सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सहित अन्य नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकों पर भी नजर रहेगी। ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए आर्थिक सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ जटिल वैश्विक परिस्थितियों के बीच कूटनीतिक संतुलन साधने का महत्वपूर्ण अवसर होगा।





