नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक में उस समय राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया जब विपक्षी दलों ने नवगठित एनसीपीआई (नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया) के प्रतिनिधियों को बैठक में आमंत्रित किए जाने का विरोध करते हुए प्रतीकात्मक वॉकआउट किया। हालांकि विरोध दर्ज कराने के बाद विपक्षी नेता दोबारा बैठक में शामिल हो गए।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि एनसीपीआई के सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष अलग पहचान और मान्यता के लिए आवेदन दिया है। ऐसे में सरकार सभी पक्षों को आमंत्रित करने की अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। उन्होंने कहा, “20 सांसदों को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है? सरकार का दायित्व है कि सभी संबंधित पक्षों को बातचीत के लिए बुलाया जाए।”
विपक्ष का आरोप है कि जिन सांसदों को बैठक में बुलाया गया, उन्हें अभी तक लोकसभा में अलग संसदीय दल के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं मिली है। ऐसे में उन्हें सर्वदलीय बैठक में शामिल करना संसदीय परंपराओं के विपरीत है। इसी मुद्दे पर विपक्षी दलों ने बैठक से कुछ समय के लिए बहिर्गमन किया।
बैठक के दौरान सरकार ने आगामी मानसून सत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए सभी दलों से सहयोग की अपील की। रिजिजू ने कहा कि सरकार महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा चाहती है और संसद में सकारात्मक माहौल बनाए रखना सभी दलों की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सत्र के दौरान जनहित के मुद्दों पर सार्थक चर्चा होगी।
गौरतलब है कि हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद अलग होकर एनसीपीआई के साथ जुड़े हैं। इसी घटनाक्रम के बाद उनके बैठक में शामिल होने को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। विपक्ष इस कदम को दलबदल को अप्रत्यक्ष मान्यता देने के रूप में देख रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि सभी निर्वाचित सांसदों को संवाद प्रक्रिया में शामिल करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।





