देहरादून। केंद्र सरकार ने उत्तराखंड की अलकनंदा और भागीरथी नदी घाटियों में नई जलविद्युत परियोजनाओं को अनुमति देने से मना कर दिया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इन संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में पहले से मौजूद या निर्माणाधीन परियोजनाओं के अलावा किसी नई परियोजना को मंजूरी नहीं दी जाएगी।
सरकार का कहना है कि इन नदी घाटियों में बड़े पैमाने पर हाइड्रो प्रोजेक्ट्स से पर्यावरणीय दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार भागीरथी की लगभग 80 प्रतिशत और अलकनंदा की करीब 65 प्रतिशत धारा प्रभावित हो चुकी है, जिससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह कमजोर हुआ है।
वर्ष 2013 की आपदा के बाद इन परियोजनाओं को लेकर विवाद और बढ़ गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी अलकनंदा–भागीरथी बेसिन की परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों पर गंभीर चिंता जताई थी। इसके बाद कई परियोजनाओं की समीक्षा की गई और कुछ को रोकने की सिफारिश सामने आई।
उत्तराखंड सरकार लंबे समय से नई परियोजनाओं के लिए केंद्र से मंजूरी मांगती रही है। उनका तर्क है कि प्रदेश अपनी कुल जलविद्युत क्षमता का केवल 40 प्रतिशत ही उपयोग कर पा रहा है और बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए नई परियोजनाएं जरूरी हैं। पिछले वर्ष मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने लगभग 21 नई परियोजनाओं को मंजूरी देने का अनुरोध किया था।
पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने हिमालयी क्षेत्र की नाजुक भौगोलिक स्थिति को देखते हुए बड़े बांधों और सुरंग आधारित परियोजनाओं पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि ग्लेशियरों के पिघलने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं के बीच बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट भविष्य में और खतरे बढ़ा सकते हैं।
केंद्र सरकार का यह कदम गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, उत्तराखंड में ऊर्जा विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस फिर से तेज हो गई है।





