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मतदाताओं के नाम हटाने के कथित खेल में पुलिस को झटका, एफआईआर पर रोक लगाने की मांग खारिज

एसआईआर में पहचान के दुरुपयोग का मामला, अदालत ने पुलिस की अंतरिम राहत याचिका ठुकराई

हल्द्वानी। चुनावी प्रक्रिया में पहचान के कथित दुरुपयोग और 28 मतदाताओं के नाम हटाने के ऑनलाइन आवेदन का मामला अब पुलिस के लिए कानूनी चुनौती बनता जा रहा है। निर्वाचन आयोग के पोर्टल पर दूसरे व्यक्ति के नाम से आवेदन किए जाने की शिकायत में एफआईआर दर्ज कर जांच के मजिस्ट्रेटी आदेश पर रोक लगाने पहुंची बनभूलपुरा पुलिस को अदालत से फिलहाल राहत नहीं मिली। प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने पुलिस की अंतरिम रोक की मांग खारिज कर दी। इससे एफआईआर दर्ज कर विवेचना करने का मजिस्ट्रेट का आदेश फिलहाल प्रभावी बना हुआ है।

मामला बनभूलपुरा क्षेत्र के इंदिरानगर निवासी इकराम अली की शिकायत से जुड़ा है। अधिवक्ता मनीष कुमार पांडे के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान किसी अज्ञात व्यक्ति ने शिकायतकर्ता की पहचान का कथित दुरुपयोग करते हुए निर्वाचन आयोग के पोर्टल पर फॉर्म-7 के जरिए भाग संख्या 134 के 28 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रस्तुत किए। शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने न तो ये आवेदन किए और न ही किसी को ऐसा करने के लिए अधिकृत किया।

पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर इकराम अली ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(3) के तहत न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, हल्द्वानी ने 6 अक्टूबर को एफआईआर दर्ज कर नियमानुसार विवेचना करने के निर्देश दिए।

मजिस्ट्रेटी आदेश के खिलाफ पुलिस की चुनौती

मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देते हुए बनभूलपुरा पुलिस ने पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर अंतरिम रोक की मांग की। 30 अक्टूबर को प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश सुजीत कुमार की अदालत ने पुलिस की स्थगन याचिका खारिज कर दी। अदालत ने पुलिस अधिकारी को इस मामले में पीड़ित पक्ष के रूप में याचिका दाखिल करने का अधिकारी नहीं माना। साथ ही संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने पर एफआईआर दर्ज कर जांच करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी बताया।

7 दिसंबर को अगली सुनवाई

पुनरीक्षण याचिका पर अंतिम फैसला अभी बाकी है। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 7 दिसंबर की तारीख तय की है। फिलहाल अंतरिम राहत नहीं मिलने से एफआईआर दर्ज कर जांच करने का मजिस्ट्रेटी आदेश प्रभावी है। अब निगाहें अगली सुनवाई और मामले की विवेचना पर टिकी हैं।

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