नई दिल्ली, 1 सितंबर। नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी आपदा ने हजारों लोगों को प्रभावित किया है। इस त्रासदी के बाद दुनिया के सबसे महंगे नागरिक पृथ्वी-अवलोकन उपग्रहों में शामिल NISAR की भूमिका और उसकी उपलब्ध जानकारी को लेकर सवाल उठने लगे हैं। NASA और ISRO का यह संयुक्त मिशन खास तौर पर ग्लेशियर, भूस्खलन और धरती की सतह में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए तैयार किया गया है।
NISAR से क्यों थीं बड़ी उम्मीदें
करीब 1.3 अरब डॉलर की लागत वाला NISAR उपग्रह जुलाई 2025 में लॉन्च किया गया था। इसमें अत्याधुनिक Synthetic Aperture Radar (SAR) तकनीक लगी है, जो बादलों और रात के समय भी धरती की सतह का अध्ययन कर सकती है। इसका उद्देश्य ग्लेशियरों की स्थिति, भूस्खलन, भूकंपीय गतिविधियों और जमीन में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को समझना है।
नेपाल की हालिया त्रासदी ऐसे ही हिमालयी खतरों से जुड़ी है। रासुवा क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े हिस्से के ढहने के बाद पानी, बर्फ और मलबे ने करीब 100 किलोमीटर तक तबाही मचाई।
आपदा से पहले पहाड़ में बदलाव के संकेत
हालांकि शुरुआती रिपोर्टों में NISAR से नेपाल बाढ़ का कोई सार्वजनिक आकलन उपलब्ध नहीं होने पर सवाल उठे थे, बाद के विश्लेषण में सामने आया कि NISAR के रडार डेटा में आपदा से पहले संबंधित पहाड़ी ढलान पर कई मीटर तक जमीन के खिसकने के संकेत दर्ज हुए थे। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बदलाव उस क्षेत्र में था जहां बाद में बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा ढह गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि जमीन में बदलाव का पता चलना अपने आप में किसी निश्चित भूस्खलन की भविष्यवाणी नहीं करता। इसके लिए लगातार सैटेलाइट निगरानी, भूगर्भीय अध्ययन और जमीन पर सेंसर से प्राप्त जानकारी को एक साथ देखना जरूरी है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत
नेपाल की इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्रों में बेहतर सैटेलाइट निगरानी और समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्था की जरूरत को फिर सामने ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में सैटेलाइट से मिलने वाले डेटा को नियमित रूप से साझा करने और स्थानीय प्रशासन तक तेजी से पहुंचाने से भविष्य की आपदाओं में नुकसान कम किया जा सकता है।





