मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने जबरन वसूली के एक मामले में मुंबई के कारोबारी बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल की वर्ष 2017 में हुई गिरफ्तारी को अवैध करार दिया है। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह दो सप्ताह के भीतर कारोबारी को 5 लाख रुपये का मुआवजा दे। साथ ही, मामले में शामिल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और संबंधित मजिस्ट्रेट के आचरण की जांच कराने का भी आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ ने कहा कि मामले में एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने कथित तौर पर एक डेवलपर के साथ मिलीभगत कर अपने पद का दुरुपयोग किया। अदालत के अनुसार, कारोबारी को जबरन वसूली के मामले में फंसाने के लिए पुलिस तंत्र का अनुचित इस्तेमाल किया गया।
फ्लैट के सौदे से जुड़ा था मामला
मामला मुंबई के अंधेरी पूर्व स्थित एक हाउसिंग सोसायटी के पुनर्विकास से जुड़ा है। बिपिन अग्रवाल अपनी सास की ओर से पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के रूप में फ्लैट के सौदे को लेकर डेवलपर से बातचीत कर रहे थे। आरोप है कि 4 अगस्त 2017 को डेवलपर के कार्यालय में उन्हें दो लाख रुपये अग्रिम राशि के रूप में दिए गए। इसके तुरंत बाद पुलिस मौके पर पहुंची और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 384 के तहत जबरन वसूली का मामला दर्ज किया गया।
अग्रवाल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर गिरफ्तारी को चुनौती दी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें गलत तरीके से मामले में फंसाया गया।
पुलिस रिकॉर्ड में मिलीं गंभीर खामियां
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने गिरफ्तारी से संबंधित दस्तावेजों में तारीखों की काट-छांट, स्टेशन डायरी की विरोधाभासी प्रविष्टियों और गिरफ्तारी के आधार से जुड़ी जानकारी में कमियां पाईं। अदालत ने कहा कि पुलिस यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि गिरफ्तारी क्यों जरूरी थी और दो लाख रुपये दिए जाने के पीछे की वास्तविक वजह की जांच क्यों नहीं की गई।
अदालत ने यह भी पाया कि कारोबारी को पुलिस हिरासत में छह दिन और न्यायिक हिरासत में 20 दिन रखा गया। मजिस्ट्रेट ने भी हिरासत बढ़ाने के आदेश देते समय पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए।
पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई के निर्देश
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने, जरूरत पड़ने पर उन्हें तत्काल निलंबित करने और उचित स्थिति में मुआवजे की राशि उनके वेतन से वसूलने पर विचार करने का निर्देश दिया। अदालत ने संबंधित मजिस्ट्रेट के खिलाफ उचित कार्रवाई के लिए फैसले को हाई कोर्ट की प्रशासनिक समिति के समक्ष रखने को भी कहा।
अदालत ने माना कि अवैध गिरफ्तारी से कारोबारी को आर्थिक नुकसान के साथ उनकी प्रतिष्ठा को भी गंभीर क्षति पहुंची।





