देहरादून। प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज, दून मेडिकल कॉलेज में रैगिंग का एक और मामला सामने आने से संस्थान की एंटी रैगिंग व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। रैगिंग रोकने के लिए सख्त व्यवस्था और निगरानी के दावों के बावजूद सामने आए नए मामले ने कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
मामले ने इसलिए भी चिंता बढ़ाई है क्योंकि दून मेडिकल कॉलेज में इससे पहले भी रैगिंग को लेकर शिकायतें सामने आ चुकी हैं। जनवरी 2026 में जूनियर छात्रों के साथ मारपीट के मामले में एंटी रैगिंग कमेटी की जांच के बाद नौ एमबीबीएस छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। दो छात्रों को दो माह के लिए कक्षाओं से निलंबित करने के साथ हॉस्टल से निष्कासित किया गया और प्रत्येक पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था। सात अन्य छात्रों पर भी अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई थी।
कार्रवाई के बावजूद नहीं थम रही रैगिंग
नए मामले ने कॉलेज में रैगिंग की रोकथाम के लिए लागू निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थान में वरिष्ठ और कनिष्ठ छात्रों के बीच अनुशासन बनाए रखना प्रशासन की अहम जिम्मेदारी है। बावजूद इसके बार-बार शिकायतों का सामने आना व्यवस्था की खामियों की ओर इशारा करता है।
इससे पहले सामने आए मामलों में छात्रों ने वरिष्ठों पर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे। जनवरी के मामले में शिकायत के बाद कॉलेज की एंटी रैगिंग कमेटी ने जांच की और दोषी छात्रों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी।
लगातार सामने आ रहे मामलों के बीच अब सवाल यह है कि केवल घटना के बाद कार्रवाई करने के बजाय रैगिंग को रोकने के लिए कॉलेज प्रशासन निगरानी व्यवस्था को कितना प्रभावी बना पाता है। छात्रों की सुरक्षा और सुरक्षित शैक्षणिक माहौल सुनिश्चित करने के लिए शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई के साथ-साथ हॉस्टल और परिसर में नियमित निगरानी जरूरी है।
दून मेडिकल कॉलेज में सामने आया ताजा मामला एक बार फिर यह सवाल छोड़ गया है कि सख्त नियम और कार्रवाई के बावजूद रैगिंग की घटनाओं पर पूरी तरह अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है।





