अगरतला। त्रिपुरा में हथियार डालकर मुख्यधारा में लौट चुके सात उग्रवादी संगठनों के सदस्यों ने सरकार की अपील के बावजूद अपना 72 घंटे का राज्यव्यापी सड़क और रेल नाकाबंदी आंदोलन जारी रखा है। प्रदर्शनकारी 11 सूत्रीय मांगों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। इसके चलते राज्य के कई हिस्सों में यातायात और रेल सेवाएं प्रभावित हुई हैं।
प्रदर्शन का नेतृत्व पहले नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT) के विभिन्न गुटों और ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (ATTF) से जुड़े संगठनों ने किया था। बाद में चार अन्य संगठन भी आंदोलन में शामिल हो गए। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में 2024 में केंद्र और त्रिपुरा सरकार के साथ हुए समझौते को पूरी तरह लागू करना, सभी आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों को स्वीकार करना और उनके खिलाफ लंबित मामलों को वापस लेना शामिल है।
जिरानिया के उपमंडल दंडाधिकारी अनिमेष धर ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर नाकाबंदी समाप्त करने की अपील की, लेकिन संयुक्त समिति ने मांगें पूरी होने तक आंदोलन वापस लेने से इनकार कर दिया। प्रशासन का कहना है कि प्रदर्शनकारियों की मांगों को उच्च अधिकारियों तक पहुंचा दिया गया है।
NLFT (Original) के नेता प्रसेनजीत देबबर्मा ने कहा कि करीब 1,200 से अधिक कैडरों में अब तक केवल 91 को पुलिस ने स्वीकार किया है। उन्होंने सभी पात्र कैडरों को सूची में शामिल करने और लंबित पुलिस मामलों को वापस लेने की मांग की। मांगें नहीं माने जाने पर आंदोलन और तेज करने की चेतावनी भी दी गई है।
गौरतलब है कि 4 सितंबर 2024 को केंद्र, त्रिपुरा सरकार, NLFT और ATTF के बीच समझौता हुआ था। इसके तहत उग्रवाद छोड़ने वाले लोगों के पुनर्वास और त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए 250 करोड़ रुपये के विशेष पैकेज को मंजूरी दी गई थी। समझौते के बाद कई उग्रवादियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया था।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि समझौते में किए गए पुनर्वास संबंधी वादों को अपेक्षित गति से लागू नहीं किया गया। इसी को लेकर अब सड़क और रेल मार्ग बाधित कर सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है।





