पेरिस/वर्साय (फ्रांस)। जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान एक बड़े कूटनीतिक घटनाक्रम में अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए।
यह समझौता लंबे समय से चले आ रहे अमेरिका–ईरान तनाव और क्षेत्रीय संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसे एक “मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU)” के रूप में तैयार किया गया है, जिसके तहत दोनों देशों ने तत्काल संघर्ष विराम और सैन्य गतिविधियों में कमी पर सहमति जताई है।
रिपोर्टों के अनुसार, समझौते में अगले 60 दिनों के लिए अस्थायी युद्धविराम लागू करने का प्रावधान है, जिसके दौरान व्यापक शांति वार्ताएं आयोजित की जाएंगी। इस दौरान दोनों पक्ष स्थायी समाधान की दिशा में काम करेंगे।
समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी को स्वीकार किया गया है, जबकि अमेरिका ने यह स्पष्ट किया है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके साथ ही ईरान पर लगे कुछ प्रतिबंधों में चरणबद्ध ढील और आर्थिक सहयोग पर भी सहमति बनी है।
इसके अलावा, क्षेत्रीय समुद्री मार्गों—विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य—को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सुरक्षित और खुला रखने पर भी दोनों देशों ने सहमति जताई है। इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और तेल बाजारों में स्थिरता आने की उम्मीद जताई जा रही है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस समझौते को “विश्व शांति की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि” बताया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इसकी सफलता इसके क्रियान्वयन और क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगी।
हालांकि समझौते के बाद भी कई मुद्दे अनसुलझे हैं, लेकिन इसे अमेरिका और ईरान के संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।





