नई दिल्ली। कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए तीन भाषा पढ़ाई अनिवार्य करने संबंधी CBSE की नई नीति अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में दाखिल जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने की सहमति दे दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नई व्यवस्था छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक बोझ डालेगी और स्कूलों में अव्यवस्था की स्थिति पैदा करेगी।
दरअसल, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने हाल ही में एक सर्कुलर जारी कर 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 में तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया है। नई नीति के तहत छात्रों को कम से कम दो भारतीय भाषाएं पढ़नी होंगी। विदेशी भाषा को केवल तीसरी भाषा या अतिरिक्त चौथे विषय के रूप में चुना जा सकेगा।
इस फैसले के खिलाफ दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई के अभिभावकों, शिक्षकों और छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि यह नीति अचानक लागू की जा रही है, जिससे छात्रों और स्कूलों के सामने गंभीर समस्या खड़ी हो सकती है। उन्होंने कहा कि बोर्ड परीक्षाओं से पहले छात्रों पर नई भाषा का दबाव “अराजकता” पैदा करेगा।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि CBSE ने पहले अप्रैल 2026 में जारी अधिसूचना में इस नियम को 2029-30 तक टालने की बात कही थी, लेकिन बाद में अचानक नीति बदल दी गई। इससे स्कूलों की शैक्षणिक योजना और छात्रों की तैयारी प्रभावित हुई है। याचिका में यह भी कहा गया है कि कई स्कूलों में प्रशिक्षित भाषा शिक्षक और आवश्यक पाठ्य सामग्री उपलब्ध नहीं है।
CBSE ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा है कि यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचा (NCF-SE) 2023 के अनुरूप उठाया गया है। बोर्ड के अनुसार इससे भारतीय भाषाओं को बढ़ावा मिलेगा और छात्रों में भाषाई दक्षता विकसित होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार और CBSE से विस्तृत जवाब मांगा है। इस मुद्दे पर अगली सुनवाई जल्द होने की संभावना है
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को बड़ा झटका लगा है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने बुधवार को टीएमसी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया। उनके इस कदम को पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और नेतृत्व से नाराजगी के तौर पर देखा जा रहा है।
बारासात लोकसभा सीट से चार बार सांसद रह चुकी काकोली घोष दस्तीदार ने हाल ही में पार्टी नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाए थे। इससे पहले उन्होंने बारासात संगठनात्मक जिला अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दिया था। उन्होंने चुनावी रणनीतिकार संस्था आई–पैक (I-PAC) की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है।
राजनीतिक हलकों में उस समय हलचल और बढ़ गई जब काकोली घोष दस्तीदार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की अध्यक्षता वाली एक प्रशासनिक बैठक में शामिल हुईं। बताया जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें इस कार्यक्रम से दूरी बनाने को कहा था, लेकिन इसके बावजूद उनकी मौजूदगी ने टीएमसी में अंदरूनी खींचतान की अटकलों को और तेज कर दिया।
सूत्रों के अनुसार काकोली घोष दस्तीदार पार्टी के फैसलों और संगठन में बढ़ते बाहरी प्रभाव से नाराज थीं। उन्होंने हाल के विधानसभा चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी भी ली थी। पार्टी के भीतर लगातार हो रहे इस्तीफों और असंतोष के कारण टीएमसी नेतृत्व पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है।
हालांकि काकोली घोष दस्तीदार ने लोकसभा सदस्य पद से इस्तीफा नहीं दिया है और वह फिलहाल सांसद बनी रहेंगी। टीएमसी की ओर से अब तक उनके इस्तीफे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है।






