नई दिल्ली। भारत की गन्ना और चीनी नीतियों को लेकर ऑस्ट्रेलिया ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में सवाल उठाए हैं। ऑस्ट्रेलिया ने WTO की कृषि समिति के समक्ष भारत से घरेलू गन्ना समर्थन से जुड़े आंकड़ों और नीतियों पर स्पष्टीकरण मांगा है। उसका दावा है कि वर्ष 2018-19 से 2024-25 के दौरान भारत का गन्ना किसानों को दिया गया समर्थन WTO के तय मानकों से काफी अधिक रहा है।
ऑस्ट्रेलिया के अनुसार, WTO के कृषि समझौते के तहत किसी कृषि उत्पाद को दिया जाने वाला बाजार मूल्य समर्थन उत्पादन के कुल मूल्य के 10 प्रतिशत की सीमा के भीतर होना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया ने अपनी गणना के आधार पर दावा किया है कि भारत में गन्ने के लिए यह समर्थन निर्धारित सीमा से काफी ऊपर रहा।
1.52 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा समर्थन
ऑस्ट्रेलिया की ओर से WTO में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में गन्ने के लिए बाजार मूल्य समर्थन 2018-19 में करीब 1.125 लाख करोड़ रुपये था। 2024-25 में यह बढ़कर करीब 1.52 लाख करोड़ रुपये हो गया। आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 में यह समर्थन करीब 1.55 लाख करोड़ रुपये के उच्च स्तर पर पहुंच गया था।
ऑस्ट्रेलिया ने भारत की गन्ना मूल्य व्यवस्था का भी उल्लेख किया है। केंद्र सरकार गन्ने के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) तय करती है, जो चीनी मिलों के लिए किसानों को भुगतान किए जाने वाले न्यूनतम मूल्य का आधार है। इसके अलावा कुछ राज्यों में किसानों को राज्य परामर्श मूल्य (SAP) के तहत अतिरिक्त भुगतान भी मिलता है।
भारत पहले भी उठा चुका है पुराने आधार मूल्य का मुद्दा
गन्ना समर्थन की गणना को लेकर भारत और कुछ अन्य देशों के बीच WTO में पहले भी विवाद रहा है। भारत ने कृषि सब्सिडी की गणना में इस्तेमाल होने वाले 1986-88 के पुराने संदर्भ मूल्य पर सवाल उठाया है। उसका तर्क रहा है कि इतने पुराने मूल्य को आधार बनाने से मौजूदा समर्थन का वास्तविक आकलन प्रभावित होता है।
ऑस्ट्रेलिया ने फिलहाल भारत के खिलाफ किसी नए आदेश या औपचारिक कार्रवाई की मांग नहीं की है। उसने नीतियों को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है और इस मुद्दे पर भारत तथा अन्य WTO सदस्यों के साथ बातचीत की पेशकश की है।





