नई दिल्ली। विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर संसद की संयुक्त समिति (JPC) की पहली बैठक में गृह मंत्रालय ने सरकार का पक्ष रखा। गृह मंत्रालय ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन किसी समुदाय या धार्मिक संगठन को निशाना बनाने के लिए नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय हित, आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं को ध्यान में रखकर लाए गए हैं।
गृह सचिव गोविंद मोहन के नेतृत्व में मंत्रालय के अधिकारियों ने समिति के सदस्यों को विधेयक के विभिन्न प्रावधानों और विदेशी फंडिंग से जुड़े आंकड़ों की जानकारी दी। मंत्रालय के अनुसार FCRA मूल रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कानून है और इसका उद्देश्य विदेशी धन के भारत में प्रवेश तथा उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित करना है।
विदेशी फंडिंग पर सरकार ने दिए आंकड़े
बैठक में मंत्रालय की ओर से बताया गया कि FCRA के तहत पंजीकृत सक्रिय गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की संख्या पिछले एक दशक में 29,022 से घटकर 14,466 रह गई है। वहीं विदेशी योगदान की राशि 2015-16 में 17,832 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 22,974 करोड़ रुपये हो गई। इसमें अमेरिका से सबसे अधिक करीब 12,113 करोड़ रुपये का योगदान आया।
मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में विदेशी योगदान का करीब 57 प्रतिशत सामाजिक गतिविधियों, 30 प्रतिशत शिक्षा और 8 प्रतिशत धार्मिक गतिविधियों में इस्तेमाल हुआ।
विपक्ष ने उठाए सवाल
विपक्षी सदस्यों ने विधेयक के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए। खास तौर पर उस प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई है, जिसके तहत FCRA लाइसेंस रद्द या समाप्त होने की स्थिति में विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटारे के लिए केंद्र सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण बनाया जा सकता है। विपक्ष का आरोप है कि इससे अल्पसंख्यक और धार्मिक संस्थानों पर असर पड़ सकता है। सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया है।
JPC के अध्यक्ष संजय जायसवाल ने कहा है कि समिति विस्तृत विचार-विमर्श के बाद अपनी रिपोर्ट 2026 के शीतकालीन सत्र में सौंपने की दिशा में काम करेगी। समिति की अगली बैठक 29 सितंबर को प्रस्तावित है।





