Top 5 This Week

Related Posts

चिराग पासवान का यूपी दांव, 403 सीटों पर चुनाव की तैयारी से NDA में बढ़ी हलचल

नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर बड़ा सियासी दांव चला है। उनकी पार्टी ने प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव की तैयारी शुरू करने का ऐलान किया है। हालांकि, अंतिम फैसला गठबंधन के स्वरूप को लेकर बाद में किया जाएगा।

चिराग पासवान ने साफ किया है कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में मजबूती से चुनाव लड़ेगी। उनका कहना है कि यदि गठबंधन होता है तो उसके तहत चुनाव लड़ा जाएगा और जरूरत पड़ने पर पार्टी अकेले मैदान में उतरने के लिए भी तैयार है। इस घोषणा को एनडीए के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत और मोलभाव की ताकत बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

बिहार से बाहर विस्तार की कोशिश

चिराग का यूपी पर फोकस पार्टी को बिहार तक सीमित क्षेत्रीय दल की छवि से बाहर निकालकर राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की कोशिश भी माना जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में एलजेपी (रामविलास) ने बिहार में जिन पांच सीटों पर चुनाव लड़ा, उन सभी पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद पार्टी का राजनीतिक वजन एनडीए में बढ़ा है।

चिराग पासवान पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी निष्ठा जताते हुए खुद को उनका ‘हनुमान’ बता चुके हैं। हालांकि अब उनका जोर इस बात पर है कि वह एनडीए का हिस्सा जरूर हैं, लेकिन उनकी पार्टी भाजपा नहीं है। हाल के बयानों और गतिविधियों से भी उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है।

दलित वोट बैंक पर नजर

उत्तर प्रदेश में चिराग की रणनीति के पीछे दलित वोट बैंक भी अहम माना जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को प्रदेश में करीब 9.4 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन वह एक भी सीट नहीं जीत सकी। ऐसे में गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच राजनीतिक जगह बनाने की संभावना को चिराग एक अवसर के रूप में देख रहे हैं।

हालांकि उत्तर प्रदेश का जातीय और राजनीतिक समीकरण बिहार से अलग है। पासी, वाल्मीकि और खटीक समेत विभिन्न दलित समुदायों की अपनी अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में 403 सीटों पर संगठन खड़ा करना और वोट को प्रभावी समर्थन में बदलना चिराग के लिए बड़ी चुनौती होगी।

2020 के बिहार मॉडल की चर्चा

चिराग के यूपी दांव की तुलना 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से भी की जा रही है। उस समय उनकी पार्टी ने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा था और कई सीटों पर उसके वोट जीत के अंतर से अधिक रहे थे। अब यूपी में यदि पार्टी अलग चुनाव लड़ती है तो करीबी मुकाबलों में उसके उम्मीदवार वोटों का समीकरण प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए यूपी का दांव चिराग के लिए सिर्फ सीट जीतने की कोशिश नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर अपनी राजनीतिक ताकत और बिहार से बाहर अपना जनाधार बढ़ाने की परीक्षा भी माना जा रहा है।

Popular Articles