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होर्मुज में तनाव के बीच खाड़ी देशों ने बहाल किया तेल निर्यात, ईरान पर बढ़ा दबाव

वैकल्पिक पाइपलाइन और समुद्री मार्गों का सहारा, युद्ध-पूर्व स्तर तक पहुंचा कच्चे तेल का निर्यात

वाशिंगटन। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव और क्षेत्रीय संघर्ष के बावजूद फारस की खाड़ी के अरब देशों ने कच्चे तेल का निर्यात लगभग युद्ध-पूर्व स्तर तक बहाल कर लिया है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) समेत अन्य उत्पादक देशों ने निर्यात के लिए वैकल्पिक पाइपलाइन, बंदरगाह और समुद्री मार्गों का इस्तेमाल बढ़ाया है। वहीं, ईरान का तेल निर्यात अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी के कारण बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

शिपिंग डेटा के अनुसार सितंबर के दौरान खाड़ी देशों से प्रतिदिन करीब 1.65 करोड़ बैरल कच्चे तेल और कंडेनसेट का निर्यात हुआ। यह मात्रा संघर्ष शुरू होने से पहले के औसत के करीब है। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि अब करीब 40 प्रतिशत तेल होर्मुज जलडमरूमध्य को पार किए बिना वैकल्पिक मार्गों से बाहर भेजा जा रहा है। संघर्ष से पहले यह हिस्सा लगभग 17 प्रतिशत था।

पाइपलाइन और वैकल्पिक बंदरगाह बने सहारा

सऊदी अरब ने लाल सागर की ओर जाने वाली अपनी पाइपलाइन व्यवस्था का इस्तेमाल बढ़ाया है, जबकि यूएई ने फुजैरा बंदरगाह तक पहुंचने वाली पाइपलाइनों पर निर्भरता बढ़ाई है। इसके अलावा खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच जहाजों के जरिए तेल को एक टैंकर से दूसरे टैंकर में स्थानांतरित करने की व्यवस्था भी बढ़ी है।

हालांकि निर्यात में सुधार के बावजूद समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित नहीं हुए हैं। होर्मुज और उसके आसपास वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों की घटनाएं सामने आती रही हैं। सितंबर के अंतिम सप्ताह में मध्य-पूर्व से कच्चे तेल का दैनिक निर्यात कुछ दिनों में युद्ध-पूर्व स्तर से भी ऊपर चला गया था।

ईरान को सबसे ज्यादा नुकसान

खाड़ी के अन्य तेल उत्पादकों ने जहां वैकल्पिक रास्तों से आपूर्ति बनाए रखने में सफलता हासिल की है, वहीं ईरान का तेल निर्यात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। अमेरिकी समुद्री नाकाबंदी के कारण ईरानी कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच काफी कम हो गई है। इससे तेहरान के राजस्व पर दबाव बढ़ने की आशंका है।

विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल की आपूर्ति में सुधार हुआ है, लेकिन डीजल, पेट्रोल और विमान ईंधन जैसे रिफाइंड उत्पादों की आपूर्ति अभी सामान्य स्तर पर नहीं पहुंची है। बढ़ी सुरक्षा लागत, महंगा टैंकर परिवहन और क्षेत्रीय हमलों का खतरा वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए अब भी चुनौती बना हुआ है।

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