Top 5 This Week

Related Posts

नेपाल की आपदा ने बढ़ाई चिंता, उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलों पर कड़ी निगरानी

देहरादून, 3 सितंबर। नेपाल में हालिया ग्लेशियर से जुड़ी आपदा के बाद उत्तराखंड में भी हिमनद झीलों से संभावित खतरे को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है। राज्य के पांच जिलों में स्थित 13 ग्लेशियर झीलों को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने संवेदनशील और संभावित रूप से खतरनाक श्रेणी में रखा है। इन झीलों की वैज्ञानिक निगरानी और जोखिम का आकलन किया जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियर झीलों में अचानक पानी बढ़ने या झील के बांध के टूटने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) आ सकती है। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर आने से जान-माल और बुनियादी ढांचे को बड़ा नुकसान हो सकता है।

पांच जिलों में सबसे अधिक खतरा

चिह्नित 13 संवेदनशील झीलों में पिथौरागढ़ की छह, चमोली की चार तथा बागेश्वर, टिहरी और उत्तरकाशी की एक-एक झील शामिल हैं। इनमें पांच झीलों को सबसे गंभीर ‘ए’ श्रेणी के जोखिम में रखा गया है। इनमें चमोली की वसुधारा ताल और पिथौरागढ़ की मबांग, प्युनग्रू तथा अन्य संवेदनशील झीलें शामिल हैं।

राज्य सरकार ने संवेदनशील झीलों की लगातार वैज्ञानिक निगरानी के साथ अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने पर जोर दिया है। इसके लिए आधुनिक सेंसर और अन्य उपकरण लगाए जाने की योजना है।

सारस्वती ताल और केदारताल का होगा सर्वे

सरकार ने चमोली जिले की सारस्वती ताल और उत्तरकाशी की केदारताल का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे कराने का निर्णय लिया है। विशेषज्ञों की टीमें इन क्षेत्रों में जाकर झीलों की स्थिति, पानी की मात्रा और संभावित जोखिम का अध्ययन करेंगी।

केदारनाथ आपदा से लिया सबक

नेपाल की त्रासदी ने वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा की याद भी ताजा कर दी है। जून 2013 में चौराबाड़ी ताल क्षेत्र से अचानक पानी और मलबा आने के बाद केदार घाटी में भारी तबाही हुई थी। इसके बाद 2021 में चमोली में भी ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में बदलते मौसम और ग्लेशियरों की अस्थिरता के बीच समय रहते चेतावनी और निकासी व्यवस्था को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

 

Popular Articles