नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में करीब एक महीने की शांति के बाद अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष फिर भड़क गया है। अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरानी रॉकेट लांचरों को निशाना बनाकर हवाई हमले किए। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों की ओर मिसाइलें दागीं। क्षेत्र में तनाव बढ़ने के साथ व्यापक संघर्ष की आशंका भी गहरा गई है।
अमेरिकी सेना के अनुसार, 30 अगस्त को की गई कार्रवाई में उन ईरानी रॉकेट लांचरों को निशाना बनाया गया, जिन्हें अमेरिकी अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खतरा बताया था। अमेरिका का दावा है कि ईरानी बल समुद्री मार्ग में रॉकेट और बारूदी सुरंगें तैनात करने की तैयारी कर रहे थे। अमेरिकी कार्रवाई को लंबे अंतराल के बाद ईरान के खिलाफ पहली बड़ी सैन्य कार्रवाई माना जा रहा है।
हमले के बाद ईरान ने अमेरिका पर तनाव भड़काने का आरोप लगाया। तेहरान की ओर से जॉर्डन स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले किए गए, जिन्हें जॉर्डन की वायु रक्षा प्रणाली ने रोक दिया। दोनों पक्षों ने घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग दावे किए हैं।
होर्मुज बना सबसे बड़ा चिंता का केंद्र
इस संघर्ष में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे अहम रणनीतिक क्षेत्र बन गया है। दुनिया के प्रमुख ऊर्जा मार्गों में शामिल इस जलमार्ग से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और एलएनजी की आपूर्ति होती है। यहां तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
संघर्ष के बीच जलमार्ग से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पहले ही सामान्य स्तर से काफी कम है। अमेरिका ने समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखने की कोशिश तेज की है, जबकि ईरान लगातार संकेत दे रहा है कि वह होर्मुज को अपने रणनीतिक दबाव के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है।
कूटनीतिक रास्ता भी खुला
सैन्य तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच कूटनीति की संभावनाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। मध्यस्थ देशों की ओर से बातचीत बहाल करने के प्रयास जारी रहे हैं, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध और होर्मुज की सुरक्षा को लेकर दोनों पक्षों के बीच गंभीर मतभेद बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका-ईरान संघर्ष दोबारा लंबा खिंचता है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की कीमतों, वैश्विक व्यापार और समुद्री आपूर्ति शृंखला पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।





