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उत्तराखंड में इस बार बीजों वाली राखियों से सजेगी भाइयों की कलाई, महिलाओं ने पेश की पर्यावरण की मिसाल

देहरादून। रक्षाबंधन के पर्व पर इस बार उत्तराखंड में भाई-बहन के स्नेह के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देखने को मिलेगा। प्रदेश के स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं बीज, मोती और पारंपरिक ऐपण कला से आकर्षक और पर्यावरण अनुकूल राखियां तैयार कर रही हैं। इन राखियों की खासियत यह है कि इन्हें बाद में मिट्टी में रोपकर पौधे के रूप में विकसित किया जा सकता है।

महिलाओं ने स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक हुनर को आधुनिक सोच से जोड़ते हुए बीज राखियों का निर्माण किया है। राखियों में विभिन्न प्रकार के बीजों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य त्योहार के बाद राखियों को कूड़े में फेंकने के बजाय उन्हें प्रकृति से जोड़ना है।

स्वरोजगार के साथ पर्यावरण संरक्षण

बीज राखियों के निर्माण से ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार का अवसर भी मिल रहा है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं इन राखियों को तैयार कर बाजार तक पहुंचा रही हैं। इससे उनकी आमदनी बढ़ने के साथ स्थानीय उत्पादों और हस्तशिल्प को भी बढ़ावा मिल रहा है।

इन राखियों में उत्तराखंड की लोक संस्कृति की झलक भी दिखाई दे रही है। ऐपण कला के प्रयोग से तैयार राखियां पारंपरिक और आकर्षक नजर आती हैं। इस पहल के जरिए महिलाओं ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि त्योहारों की खुशियों के साथ प्रकृति की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी निभाई जा सकती है।

राखी के साथ पौधारोपण का संदेश

बीज वाली राखियों की सबसे बड़ी खासियत उनका दोहरा उपयोग है। रक्षाबंधन के बाद राखी को मिट्टी में रोपने पर उसमें मौजूद बीज से पौधा उगाया जा सकता है। इस तरह भाई-बहन के रिश्ते की याद लंबे समय तक एक पेड़ के रूप में जीवित रह सकती है।

उत्तराखंड की महिलाओं की यह पहल पारंपरिक त्योहार को पर्यावरण संरक्षण और महिला आत्मनिर्भरता से जोड़ने का उदाहरण बन रही है। इस रक्षाबंधन पर बीज राखियां न केवल कलाई पर स्नेह का प्रतीक बनेंगी, बल्कि हरियाली बढ़ाने का संदेश भी देंगी।

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