नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर CJP के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन ने राजनीतिक दलों की युवा रणनीति को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। NEET, पेपर लीक, बेरोजगारी और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर युवाओं की लामबंदी के बाद कांग्रेस ने भी छात्रों और युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत करने पर जोर बढ़ाया है।
कांग्रेस ने आंदोलन में सीधे शामिल होने के बजाय शुरुआत में अपनी अलग रणनीति अपनाई। पार्टी का मानना था कि यदि वह जंतर-मंतर के आंदोलन में सीधे उतरती है तो आंदोलन के राजनीतिकरण का आरोप लग सकता है और छात्रों के मूल मुद्दे पीछे छूट सकते हैं। इसी वजह से राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के जरिए युवाओं से सीधे संवाद का रास्ता चुना।
हालांकि आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के बाद कांग्रेस की सक्रियता भी तेज हुई। राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दों को लेकर सरकार पर निशाना साधा और संसद के भीतर तथा सड़क पर विरोध दर्ज कराया। पार्टी ने पेपर लीक, परीक्षा सुधार और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों को लगातार उठाने की रणनीति अपनाई।
CJP के आंदोलन की खास बात यह रही कि डिजिटल माध्यम से शुरू हुई मुहिम ने जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में युवाओं को जोड़ लिया। 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च के दौरान प्रदर्शन ने व्यापक राजनीतिक ध्यान खींचा। इसके बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की भूमिका को लेकर भी सियासी बहस तेज हो गई।
कांग्रेस के सामने अब चुनौती सिर्फ सरकार को घेरने की नहीं, बल्कि युवाओं के बीच अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत करने की है। पार्टी का प्रयास है कि छात्र, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को लंबे समय तक अपने राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाया जाए। ऐसे में CJP आंदोलन ने कांग्रेस समेत सभी दलों को यह संकेत जरूर दिया है कि युवा वर्ग की नाराजगी को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं होगा।





