नई दिल्ली। अंतरिक्ष में बढ़ते कचरे यानी स्पेस डेब्रिस की चुनौती से निपटने के लिए भारत ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि भारत ने वर्ष 2030 तक अंतरिक्ष अभियानों से नया कचरा पैदा न होने देने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन (DFSM) के तहत सरकारी और निजी क्षेत्र के भारतीय अंतरिक्ष मिशनों को निर्धारित मानकों का पालन करना होगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह के अनुसार, मार्च 2026 तक भारतीय उपग्रह मिशनों से जुड़े 129 ट्रैक किए जा सकने वाले स्पेस डेब्रिस कक्षा में मौजूद हैं। इनमें निष्क्रिय उपग्रहों के साथ-साथ विभिन्न प्रक्षेपण यानों के रॉकेट बॉडी भी शामिल हैं।
मिशन डिजाइन में ही डेब्रिस प्रबंधन
ISRO ने स्पेस डेब्रिस को कम करने के लिए मिशन की डिजाइन और योजना के स्तर पर ही उपायों को शामिल करना शुरू कर दिया है। LEO में काम करने वाले उपग्रहों के लिए मिशन पूरा होने के बाद उन्हें नियंत्रित तरीके से कक्षा से बाहर निकालने यानी डी-ऑर्बिटिंग की व्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है।
पुराने अंतरिक्ष कचरे को हटाने पर भी काम
ISRO पहले से मौजूद अंतरिक्ष कचरे को हटाने की तकनीक पर भी काम कर रहा है। इसके लिए रोबोटिक आर्म, रेंडेजवस और प्रॉक्सिमिटी ऑपरेशन जैसी तकनीकों का अध्ययन किया जा रहा है। 2025 में SpaDeX मिशन के दौरान भारत ने स्वायत्त रेंडेजवस, डॉकिंग और अनडॉकिंग क्षमता का सफल प्रदर्शन किया था।
इसके अलावा NETRA परियोजना के माध्यम से अंतरिक्ष में मौजूद वस्तुओं की निगरानी और संभावित टकराव के जोखिम का आकलन किया जा रहा है। भारत का लक्ष्य अंतरिक्ष अभियानों को सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है, ताकि भविष्य में स्पेस डेब्रिस की समस्या को नियंत्रित किया जा सके।





