नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण के मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि ऐसी घटनाओं की जानकारी होने के बावजूद शिकायत दर्ज न कराना या उसे दबाना कानून का उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना प्रत्येक व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी है और ऐसा न करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत बाल यौन शोषण के मामलों की रिपोर्ट करना अनिवार्य है। यदि कोई व्यक्ति, संस्था, स्कूल, अस्पताल या अन्य संबंधित पक्ष घटना की जानकारी होने के बावजूद पुलिस या सक्षम प्राधिकारी को सूचित नहीं करता, तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध केवल पीड़ित और उसके परिवार का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है। ऐसे मामलों में चुप्पी अपराधियों को संरक्षण देने के समान है। इसलिए प्रत्येक नागरिक और संस्था का दायित्व है कि मामले की तत्काल सूचना संबंधित एजेंसियों को दें।
अदालत ने यह भी कहा कि बाल यौन शोषण के मामलों में संवेदनशीलता के साथ त्वरित कार्रवाई आवश्यक है। जांच एजेंसियों और संबंधित अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़ित बच्चे की पहचान और गरिमा की रक्षा करते हुए निष्पक्ष एवं शीघ्र जांच पूरी की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो कानून का उद्देश्य केवल दोषियों को सजा दिलाना नहीं, बल्कि बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना भी है। इसलिए कानून में रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाया गया है, ताकि किसी भी घटना को छिपाया न जा सके और समय रहते पीड़ित को न्याय मिल सके।
अदालत के इस फैसले को बाल अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे स्कूलों, शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और अन्य संगठनों की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी कि वे बाल यौन शोषण की किसी भी शिकायत को नजरअंदाज न करें और कानून के अनुसार तत्काल इसकी सूचना संबंधित अधिकारियों को दें।





