नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि देश की संप्रभुता और किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, तो राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी जाएगी। अदालत ने कहा कि ड्रग्स की आपूर्ति देश की अर्थव्यवस्था और नागरिकों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालती है, इसलिए ऐसे अपराधों को राष्ट्र के खिलाफ युद्ध के समान माना जा सकता है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा एक आरोपी को दी गई जमानत रद्द करते हुए की। आरोपी पर आरोप है कि वह जेल के अंदर से मोबाइल फोन के जरिए नशा तस्करी के नेटवर्क का संचालन कर रहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस (NDPS) कानून के तहत पहले से भी समान प्रकृति के मामले दर्ज हैं। ऐसे में यह मानने का कोई आधार नहीं है कि जमानत मिलने पर वह दोबारा अपराध नहीं करेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत जमानत देने के लिए निर्धारित शर्तों का पालन अनिवार्य है।
पीठ ने आरोपी की लंबी हिरासत संबंधी दलील को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आरोपी लगभग एक वर्ष सात माह से जेल में है, जबकि दोष सिद्ध होने पर उसे 20 वर्ष तक की सजा हो सकती है। इसलिए वर्तमान अवधि को “लंबी कैद” मानकर जमानत देने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि लंबे समय तक जेल में रहने के आधार पर जमानत देने का सिद्धांत विभिन्न मामलों में अलग-अलग तरीके से लागू हुआ है और अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि जमानत के संदर्भ में “लंबी अवधि की कैद” की सटीक परिभाषा क्या होगी।
इस फैसले को ड्रग्स तस्करी के खिलाफ न्यायपालिका के सख्त रुख के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और युवाओं के भविष्य को प्रभावित करने वाले अपराधों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता से अधिक महत्व राष्ट्रीय हित को दिया जाएगा।





