नई दिल्ली, एजेंसी। वैज्ञानिक शोध और अकादमिक प्रकाशन की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के गलत उपयोग को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है। एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि वर्ष 2025 में करीब 1.5 लाख फर्जी या मनगढ़ंत संदर्भ (citations) शोध पत्रों में शामिल हो गए, जिनका स्रोत वास्तव में मौजूद ही नहीं था।
रिपोर्ट के अनुसार, यह समस्या मुख्य रूप से AI टूल्स द्वारा उत्पन्न “हैलुसिनेशन” यानी काल्पनिक या गलत जानकारी देने की प्रवृत्ति के कारण बढ़ी है। कई मामलों में AI ने ऐसे शोध और लेखक नामों का हवाला दिया जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थे, लेकिन वे संदर्भ बाद में प्री-प्रिंट और फिर पीयर-रिव्यू जर्नल्स तक पहुंच गए।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रवृत्ति वैज्ञानिक विश्वसनीयता के लिए बड़ा खतरा बन रही है, क्योंकि गलत या काल्पनिक सिटेशन्स से पूरा शोध आधार कमजोर हो सकता है। कुछ मामलों में यह भी पाया गया कि वास्तविक स्रोतों का गलत अर्थ निकालकर उन्हें भी गलत तरीके से उद्धृत किया गया।
अध्ययन में यह भी बताया गया कि AI आधारित लेखन टूल्स के बढ़ते उपयोग के साथ यह समस्या तेजी से बढ़ी है। कई शोधकर्ता ड्राफ्ट तैयार करने में AI की मदद लेते हैं, लेकिन बिना उचित सत्यापन के ये गलतियां अकादमिक प्रकाशनों में शामिल हो जाती हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि सख्त जांच और सत्यापन प्रणाली नहीं अपनाई गई, तो भविष्य में वैज्ञानिक साहित्य की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ सकता है। उन्होंने शोध पत्रों में AI-जनित संदर्भों की अनिवार्य जांच और ऑडिटिंग की सिफारिश की है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह समस्या केवल तकनीकी नहीं बल्कि अकादमिक नैतिकता से भी जुड़ी हुई है, और इसके समाधान के लिए प्रकाशकों, विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक समुदाय को मिलकर कदम उठाने होंगे।





