नई दिल्ली/अजमेर: अपने बयानों के लिए अक्सर चर्चा में रहने वाले बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने एक बार फिर विवादित टिप्पणी कर दी है। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अजमेर शरीफ दरगाह में हिंदुओं द्वारा चादर चढ़ाए जाने की परंपरा पर अपनी असहमति जताई है। उनके इस बयान ने धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर निशाना साधा है और आरोप लगाया है कि ऐसे बयानों के जरिए समाज को बांटने की कोशिश की जा रही है।
धीरेंद्र शास्त्री ने क्या कहा?
धीरेंद्र शास्त्री ने एक सभा को संबोधित करते हुए हिंदुओं की आस्था के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए:
- चादर चढ़ाने पर आपत्ति: उन्होंने कहा कि उन्हें हिंदुओं के अजमेर जाकर चादर चढ़ाने से “दिक्कत” है। उनका तर्क है कि हिंदुओं को अपनी श्रद्धा अपने ही देवी-देवताओं और तीर्थों तक सीमित रखनी चाहिए।
- आस्था का केंद्र: शास्त्री ने जोर देकर कहा कि “जब हमारे पास अपने इतने सिद्ध पीठ और ऋषि-मुनि हैं, तो कहीं और सिर झुकाने की क्या आवश्यकता है?”
- विवादित सुर: उनके इस बयान को अजमेर शरीफ दरगाह की सदियों पुरानी ‘सर्वधर्म समभाव’ वाली परंपरा पर प्रहार के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस का तीखा पलटवार: भाजपा पर साधा निशाना
कांग्रेस ने इस बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए भाजपा सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं:
- सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आरोप: कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कहा कि धीरेंद्र शास्त्री जैसे लोग भाजपा के “प्रॉक्सी” के रूप में काम कर रहे हैं ताकि चुनाव से पहले ध्रुवीकरण किया जा सके।
- गंगा-जमुनी तहजीब पर हमला: कांग्रेस ने बयान जारी कर कहा कि अजमेर शरीफ सदियों से हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक रहा है और इस तरह की टिप्पणियां देश के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाती हैं।
- कार्रवाई की मांग: विपक्षी दल ने मांग की है कि नफरत फैलाने वाले ऐसे बयानों पर प्रशासन को संज्ञान लेना चाहिए।
अजमेर दरगाह और मिश्रित संस्कृति
अजमेर स्थित ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में हिंदुओं की गहरी आस्था रही है:
- अटूट परंपरा: हर साल उर्स और सामान्य दिनों में भी लाखों हिंदू श्रद्धालु वहां चादर और अकीदत के फूल पेश करते हैं।
- धार्मिक गुरुओं की राय: दरगाह से जुड़े खादिमों और कई हिंदू संगठनों ने भी शास्त्री के बयान को ‘अनावश्यक’ बताया है, उनका कहना है कि आस्था व्यक्तिगत विषय है और इसे सीमाओं में नहीं बांधा जाना चाहिए।





