धारचुला/बीजिंग, एजेंसियां। तिब्बतन एक्शन इंस्टीट्यूट (TAI) की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने चीन की तिब्बत नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन सरकार लगभग 10 लाख तिब्बती बच्चों को जबरन सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में रख रही है, जिनमें से एक लाख से ज्यादा बच्चे महज 4 से 6 वर्ष की आयु के हैं।
TAI ने आरोप लगाया है कि इन स्कूलों का उद्देश्य तिब्बती पहचान और संस्कृति को खत्म करना है। बच्चों को उनके परिवारों से जबरन अलग कर दिया जाता है और बौद्ध धर्म की जगह चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की शिक्षा दी जाती है।
4500 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत पर हमला
रिपोर्ट तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले डॉ. ग्याल लो ने दावा किया कि यह राष्ट्रपति शी चिनफिंग की सांस्कृतिक आक्रामकता की रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद 4500 साल पुरानी तिब्बती संस्कृति और धर्म को नष्ट करना है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 18 साल से कम उम्र के बौद्ध भिक्षुओं को भी जबरन भर्ती किया जा रहा है।
ग्रामीण इलाकों में सबसे अधिक प्रभावित स्कूल
TAI ने आमदो और खाम क्षेत्र के 50 से अधिक स्कूलों का अध्ययन किया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन स्कूलों में न तो तिब्बती भाषा को बढ़ावा दिया जाता है, न ही धर्म या पारंपरिक मूल्यों को। इसके बजाय बच्चों को “चीनी राष्ट्रवाद” और “एकल सांस्कृतिक पहचान” की ओर मोड़ा जा रहा है।
TAI की अपील – संयुक्त राष्ट्र और भारत करें हस्तक्षेप
रिपोर्ट के प्रकाशन के साथ TAI ने संयुक्त राष्ट्र, भारत सरकार और वैश्विक समुदाय से अपील की है कि वे चीन से इस मुद्दे की स्वतंत्र जांच की मांग करें और तिब्बती बच्चों के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा में हस्तक्षेप करें।
4500 साल पुरानी संस्कृति नष्ट करने की कोशिश
चीन तिब्बत को अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता का हिस्सा मानता है, जबकि वहां लंबे समय से धार्मिक स्वतंत्रता, मानवाधिकारों और सांस्कृतिक पहचान को लेकर तनाव बना हुआ है। तिब्बत के निर्वासित आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा बार-बार चीन की इन नीतियों का विरोध करते रहे हैं।
चीन के बोर्डिंग स्कूलों में ‘कैद’ 10 लाख तिब्बती बच्चे





