नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एनआरआई दंपती के बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारतीय अदालतें विदेशी अदालतों के आदेश का आंख मूंदकर पालन नहीं कर सकतीं। बच्चे के भविष्य और कल्याण को ध्यान में रखते हुए भारतीय अदालतों को स्वतंत्र रूप से फैसला लेना होगा। हालांकि, विदेशी अदालत के आदेश को भी उचित महत्व देना जरूरी है।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामले बेहद संवेदनशील होते हैं। ऐसे विवादों में माता-पिता के कानूनी अधिकारों के बजाय बच्चे के हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे का कल्याण केवल आर्थिक स्थिति या भौतिक सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उसका समग्र विकास और भावनात्मक सुरक्षा भी शामिल है।
विदेशी अदालत का आदेश अंतिम आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई बच्चा कस्टडी विवाद को लेकर भारतीय अदालत के सामने आता है, तो अदालत का कर्तव्य है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए बच्चे के हितों का स्वतंत्र आकलन करे। केवल इस आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता कि विदेशी अदालत पहले ही आदेश दे चुकी है।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि विदेशी अदालत के आदेश की अवहेलना किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि भारतीय अदालत उसे स्वतः लागू करने के लिए बाध्य हो। दूसरी ओर, बच्चे के कल्याण को प्राथमिकता देने का मतलब विदेशी अदालत के आदेश को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी नहीं है।
सात वर्षीय बच्ची को अमेरिका भेजने का आदेश
यह मामला एक अमेरिकी नागरिक दंपती की सात वर्षीय बच्ची की कस्टडी से जुड़ा है। कैलिफोर्निया की अदालत ने वर्ष 2022 में माता-पिता को बच्ची की संयुक्त कस्टडी देने का आदेश दिया था। साथ ही, लिखित सहमति या अदालत की अनुमति के बिना बच्ची को कैलिफोर्निया से बाहर ले जाने पर रोक लगाई गई थी।
इसके बावजूद बच्ची की मां उसे भारत ले आई। इसके बाद पिता ने कानूनी कार्रवाई शुरू की। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ पिता की याचिका स्वीकार करते हुए बच्ची को अमेरिका वापस भेजने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा कि कस्टडी और संरक्षकता से जुड़े मामलों में अंतिम निर्णय बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।





