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एफसीआरए संशोधनों पर अमेरिकी सांसद की चिंता, भारत-अमेरिका संबंधों पर असर की चेतावनी

वॉशिंगटन। भारत के विदेशी अंशदान विनियमन कानून (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर अमेरिका में चिंता जताई गई है। एक अमेरिकी सांसद ने इन बदलावों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इससे नागरिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं पर असर पड़ सकता है तथा इसका प्रभाव भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ सकता है।

अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ ने प्रस्तावित एफसीआरए संशोधनों को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने आरोप लगाया कि नए प्रावधानों से सरकार को विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले संगठनों की संपत्तियों और गतिविधियों पर अधिक नियंत्रण मिल सकता है। स्मिथ ने विशेष रूप से चर्च और ईसाई धर्म से जुड़े चैरिटी संगठनों पर संभावित प्रभाव का मुद्दा उठाया।

एफसीआरए भारत में विदेशी योगदान प्राप्त करने और उसके उपयोग को नियंत्रित करने वाला कानून है। केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधनों का उद्देश्य विदेशी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी योगदान का उपयोग राष्ट्रीय हितों के खिलाफ न हो।

हालांकि, अमेरिकी सांसदों के एक वर्ग का मानना है कि प्रस्तावित बदलावों से गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), सामाजिक संस्थाओं और धार्मिक संगठनों के कामकाज पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। अमेरिकी संसद के कुछ अन्य सदस्यों ने भी इन प्रावधानों को लेकर चिंता जताई है।

सांसद स्मिथ ने कहा कि यदि ऐसे प्रावधान लागू होते हैं तो इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय से मजबूत होते संबंधों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने अमेरिकी प्रशासन से इस मुद्दे को भारत सरकार के साथ उठाने का आग्रह किया है।

वहीं, भारत सरकार का पक्ष है कि विदेशी फंडिंग पर निगरानी कोई असामान्य कदम नहीं है और कई देशों में विदेशी धन के नियमन के लिए इसी तरह के कानून मौजूद हैं। सरकार के अनुसार, एफसीआरए में बदलाव का उद्देश्य केवल जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

एफसीआरए संशोधन को लेकर भारत में भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। समर्थक इसे विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकने वाला कदम बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं।

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