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उत्तराखंड के चीड़ पत्ती ऊर्जा मॉडल को अपनाएगा अरुणाचल प्रदेश

चंपावत। उत्तराखंड में चीड़ की सूखी पत्तियों यानी पिरुल से ऊर्जा उत्पादन और वनाग्नि नियंत्रण की दिशा में किए जा रहे प्रयास अब दूसरे हिमालयी राज्यों के लिए भी मॉडल बन रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश ने उत्तराखंड के पिरुल आधारित ऊर्जा मॉडल को अपनाने में रुचि दिखाई है। चीड़ की पत्तियों के उपयोग से जहां जंगलों में आग के खतरे को कम किया जा सकता है, वहीं स्थानीय स्तर पर ऊर्जा उत्पादन और ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ाए जा सकते हैं।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में चीड़ की पत्तियां जंगलों में गिरकर जमा होती हैं। गर्मियों में यही सूखी पत्तियां अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण वनाग्नि का प्रमुख कारण बनती हैं। इनके संग्रहण और ऊर्जा उत्पादन में उपयोग से जंगलों से ज्वलनशील सामग्री हटाने के साथ ही जैव ऊर्जा का उत्पादन संभव है।

उत्तराखंड में पिरुल से बिजली उत्पादन के लिए गैसीफायर आधारित संयंत्रों की स्थापना और समुदाय की भागीदारी पर काम किया गया है। सरकारी स्तर पर पाइन नीडल आधारित बिजली संयंत्रों के लिए मॉडल पावर परचेज एग्रीमेंट को भी मंजूरी प्रक्रिया में शामिल किया गया था।

अरुणाचल प्रदेश में भी हिमालयी परिस्थितियों और वन क्षेत्रों को देखते हुए इस मॉडल की उपयोगिता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पिरुल को ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करने से वनाग्नि की घटनाओं पर नियंत्रण, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की संभावनाएं हैं। विशेषज्ञ अध्ययनों में भी चीड़ की पत्तियों को गैसीफिकेशन के जरिए बिजली उत्पादन के लिए उपयोगी जैव ऊर्जा स्रोत बताया गया है।

उत्तराखंड में पिरुल के संग्रहण और उपयोग को लेकर हाल के वर्षों में विभिन्न पहल की गई हैं। इनका उद्देश्य वनाग्नि रोकने के साथ पिरुल को आय और ऊर्जा के स्रोत में बदलना है। इस दिशा में विकसित मॉडल अब पूर्वोत्तर हिमालयी राज्यों तक पहुंच रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आजीविका को एक साथ बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

पिरुल से ऊर्जा उत्पादन का मॉडल हिमालयी राज्यों में वनाग्नि नियंत्रण और हरित ऊर्जा के लिए प्रभावी विकल्प बन सकता है।

 

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