नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मृत्युदंड देने के तरीके में बदलाव की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत में फिलहाल मृत्युदंड के लिए फांसी का तरीका ही लागू रहेगा। याचिका में फांसी के बजाय ऐसे विकल्प अपनाने की मांग की गई थी, जिन्हें कम पीड़ादायक माना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत दोषी को “मृत्यु होने तक फांसी” दी जाती है। अदालत ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला इस विषय पर अंतिम शब्द नहीं है। यदि केंद्र सरकार चाहे तो वैकल्पिक तरीकों की व्यवहारिकता और मानवीय पहलुओं की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित कर सकती है।
याचिका में मृत्युदंड देने के लिए फांसी के अलावा अन्य तरीकों पर विचार करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि आधुनिक चिकित्सा और तकनीकी प्रगति के दौर में ऐसे विकल्पों पर विचार होना चाहिए, जिनमें मृत्युदंड पाने वाले व्यक्ति को अपेक्षाकृत कम पीड़ा हो।
अदालत ने मामले पर विचार करते हुए वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखा। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि मृत्युदंड एक अत्यंत गंभीर और अपरिवर्तनीय सजा है। इसलिए इससे जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का विशेष महत्व है।
भारत में मृत्युदंड केवल “दुर्लभतम से दुर्लभ” (rarest of rare) मामलों में दिए जाने का सिद्धांत न्यायपालिका ने विकसित किया है। अदालतें सजा तय करते समय अपराध की गंभीरता के साथ दोषी की परिस्थितियों और सुधार की संभावना जैसे पहलुओं पर भी विचार करती हैं।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से फिलहाल भारत में मृत्युदंड लागू करने के तरीके में कोई बदलाव नहीं होगा। हालांकि, अदालत द्वारा विशेषज्ञ समिति के जरिए वैकल्पिक तरीकों की समीक्षा की संभावना खुली रखने से भविष्य में इस विषय पर नीतिगत चर्चा का रास्ता बना हुआ है।





