देहरादून। भूकंप आने से पहले धरती के भीतर होने वाले बदलावों को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों को अहम संकेत मिले हैं। देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान से जुड़े अध्ययन में रेडॉन गैस के व्यवहार में होने वाले बदलाव को भूकंपीय गतिविधियों से जोड़कर देखा गया है। शोध मार्च 2026 में रेडियोएनालिटिकल एंड न्यूक्लियर केमिस्ट्री जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, भूगर्भ में चट्टानों पर तनाव बढ़ने या उनमें सूक्ष्म दरारें बनने से रेडॉन गैस के सतह की ओर आने की मात्रा में बदलाव हो सकता है। इस बदलाव को लगातार रिकॉर्ड कर भूकंपीय गतिविधियों के संभावित संकेतों को समझने का प्रयास किया जा रहा है।
रेडॉन एक प्राकृतिक रेडियोधर्मी गैस है, जो चट्टानों और मिट्टी में मौजूद यूरेनियम के क्षय से बनती है। वैज्ञानिक लंबे समय से इसके स्तर में होने वाले असामान्य बदलावों का अध्ययन भूकंप के संभावित पूर्व संकेत के रूप में कर रहे हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि रेडॉन में बदलाव को अभी भूकंप की निश्चित भविष्यवाणी का आधार नहीं माना जा सकता। पूर्व अध्ययनों में रेडॉन की असामान्य गतिविधियों और सूक्ष्म भूकंपीय घटनाओं के बीच संबंध जरूर सामने आया है, लेकिन मौसम, तापमान, बारिश, आर्द्रता और हवा की गति जैसे कारक भी रैडॉन के स्तर को प्रभावित करते हैं।
वैज्ञानिकों का जोर अब लगातार और बहु-स्थानिक निगरानी पर है। रेडॉन के साथ अन्य गैसों और मौसम संबंधी आंकड़ों को भी एकत्र कर उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है। इससे भविष्य में भूकंप के संभावित पूर्व संकेतों को अधिक सटीक तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, फिलहाल इसे भूकंप की सटीक भविष्यवाणी की तकनीक कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन हिमालय जैसे भूकंप-संवेदनशील क्षेत्र में यह शोध वैज्ञानिक निगरानी और जोखिम आकलन के लिए महत्वपूर्ण दिशा जरूर दिखाता है।





