नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष करने पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से विचार करने को कहा है। मंगलवार को मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की सेवा की प्रकृति अन्य सरकारी कर्मचारियों से अलग है और उनकी सेवानिवृत्ति आयु भी उसी आधार पर तय की जानी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, ने राज्यों की ओर से उठाई गई वित्तीय बोझ संबंधी आपत्तियों पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी आमतौर पर अन्य सरकारी कर्मचारियों की तुलना में अधिक उम्र में सेवा में आते हैं। ऐसे में उनकी सेवा अवधि बढ़ाकर 62 वर्ष करने से राज्यों पर कोई अलग या अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा।
अधिकांश हाई कोर्ट पक्ष में
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि अधिकांश हाई कोर्ट जिला जजों की सेवानिवृत्ति आयु 61 या 62 वर्ष करने के पक्ष में हैं। हालांकि, कुछ राज्य और केंद्रशासित प्रदेश अभी इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय नहीं ले पाए हैं या प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं।
अदालत ने राज्यों के महाधिवक्ताओं से संबंधित मुख्यमंत्रियों के समक्ष इस मुद्दे को रखने और सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने पर सकारात्मक रुख अपनाने का आग्रह किया।
60 से 62 वर्ष करने की मांग
जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु देशभर में एक समान करने की मांग को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। वर्तमान में कई राज्यों में न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष है। इससे पहले अदालत ने राज्यों और हाई कोर्टों को इस विषय पर विचार कर अपनी स्थिति बताने को कहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारियों की तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती। अदालत का अंतिम फैसला देशभर में जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति व्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।





