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अदालतों में जमा रकम पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, देशभर में बनेगी समान व्यवस्था

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों और ट्रिब्यूनलों में जमा होने वाली रकम के प्रबंधन को लेकर देशभर में एक समान व्यवस्था की जरूरत बताई है। शीर्ष अदालत ने विधि आयोग से इस संबंध में व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करने पर विचार करने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी डिक्री या मध्यस्थता अवार्ड की रकम अदालत में जमा कर देना अपने आप में भुगतान नहीं माना जा सकता। रकम तभी भुगतान मानी जाएगी, जब संबंधित पक्ष उसे बिना किसी शर्त के निकाल सके।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अलोक अराधे की पीठ ने नेशनल सीड्स कॉरपोरेशन लिमिटेड और नेशनल एग्रो सीड कॉरपोरेशन (इंडिया) से जुड़े मामले में की। मामला दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील से संबंधित था, जिसमें मध्यस्थता अवार्ड की रकम जमा किए जाने के बावजूद ब्याज की देनदारी बरकरार रखी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील का निपटारा कर दिया।

अलग-अलग अदालतों में अलग व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विभिन्न हाई कोर्ट और ट्रिब्यूनल में अदालत में जमा रकम को संभालने के अलग-अलग तरीके हैं। रकम किस बैंक या वित्तीय संस्था में रखी जाए, उसका निवेश कैसे हो, ब्याज कितना मिले और रकम निकालने या दोबारा निवेश करने की प्रक्रिया क्या हो—इन मामलों में एकरूपता नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 में अदालत में जमा रकम और उस पर मिलने वाले ब्याज से जुड़े सभी पहलुओं को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है। ऐसे में अलग-अलग अदालतों के अलग निर्देशों से असमानता पैदा हो सकती है।

साझा प्लेटफॉर्म का सुझाव

पीठ ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए एक साझा प्लेटफॉर्म बनाया जा सकता है। इसके माध्यम से विभिन्न अदालतों और ट्रिब्यूनलों में जमा रकम को एक साथ प्रबंधित कर उपयुक्त वित्तीय साधनों में निवेश किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने विधि आयोग से संबंधित कानूनी प्रावधानों की समीक्षा करने, विदेशी व्यवस्थाओं का अध्ययन करने और आरबीआई, वित्त मंत्रालय तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय से परामर्श करने को कहा है।

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