वाशिंगटन। अमेरिका में नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले मेल-इन वोटिंग को लेकर ट्रंप प्रशासन और अदालतों के बीच टकराव बढ़ गया है। ट्रंप प्रशासन ने मेल-इन बैलेट पर नई पाबंदियां लागू करने की अनुमति देने के लिए एक बार फिर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। यह इस मामले में प्रशासन की तीसरी अपील है।
मामला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मार्च में जारी कार्यकारी आदेश से जुड़ा है। इसके तहत डाक से भेजे जाने वाले मतपत्रों की प्रक्रिया में नए नियम लागू करने की योजना है। प्रस्तावित व्यवस्था में राज्यों को मेल-इन बैलेट पाने वाले मतदाताओं की सूची अमेरिकी डाक सेवा (USPS) को उपलब्ध करानी होगी। साथ ही मतपत्रों पर विशिष्ट बारकोड समेत कुछ निर्धारित मानकों का पालन करना होगा। नियमों का पालन नहीं करने वाले मतपत्रों की डिलीवरी रोकने का अधिकार भी USPS को दिया जाना प्रस्तावित है।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि निचली अदालत की रोक से चुनाव प्रक्रिया के दौरान भ्रम और प्रशासनिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट से जल्द हस्तक्षेप की मांग की है, क्योंकि कई राज्यों में मध्यावधि चुनाव के लिए मेल-इन बैलेट भेजने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। उत्तरी कैरोलिना समेत कुछ राज्यों में मतपत्र मतदाताओं तक पहुंचाए जा रहे हैं।
इससे पहले संघीय न्यायाधीश इंदिरा तलवानी ने USPS को नए नियम लागू करने से रोकने वाले आदेश को आगे बढ़ा दिया था। प्रशासन इस रोक को हटाने की मांग कर रहा है। वहीं डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले राज्यों और मतदान अधिकार संगठनों ने नियमों को असंवैधानिक बताते हुए विरोध किया है। उनका तर्क है कि नई व्यवस्था से मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
मेल-इन वोटिंग अमेरिका की चुनावी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला नवंबर के मध्यावधि चुनाव में मतदान की प्रक्रिया और कई राज्यों में मतदाताओं के लिए डाक से वोट डालने के तरीके पर सीधा असर डाल सकता है। कोर्ट के सामने अब यह तय करना है कि निचली अदालत की रोक के बावजूद ट्रंप प्रशासन को नए नियम लागू करने की अनुमति दी जाए या नहीं।





