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नेपाल में फिर सड़कों पर Gen-Z, 150 दिन में फीका पड़ा बलेन शाह का जादू; इस्तीफे की मांग

काठमांडू। नेपाल के प्रधानमंत्री बलेन शाह की सरकार के खिलाफ एक बार फिर युवाओं का असंतोष सड़कों पर दिखाई दे रहा है। सत्ता संभालने के करीब 150 दिन बाद वही Gen-Z वर्ग, जिसने उन्हें पुराने राजनीतिक नेतृत्व के विकल्प के रूप में सत्ता तक पहुंचाया था, अब सरकार से नाराज नजर आ रहा है। काठमांडू में प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई है।

बलेन शाह 27 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री बने थे। इससे पहले वह काठमांडू के मेयर के तौर पर युवाओं के बीच लोकप्रिय हो चुके थे। भ्रष्टाचार और पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ उनके आक्रामक तेवर ने उन्हें Gen-Z का पसंदीदा चेहरा बनाया। मार्च के चुनाव में उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) को स्पष्ट बहुमत मिला और शाह देश के प्रधानमंत्री बने।

जिन युवाओं ने सत्ता तक पहुंचाया, वही अब विरोध में

सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद शाह के सामने कई मोर्चों पर चुनौतियां खड़ी हो गईं। भारत से लगी खुली सीमा से आने वाले सामान पर कड़े सीमा शुल्क नियम लागू करने के फैसले से आम लोगों में नाराजगी हुई, जिसके बाद सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा। इसके अलावा अनौपचारिक बस्तियों को हटाने और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर भी विरोध हुआ।

जुलाई में राइड-शेयर चालक गणेश नेपाली की आत्मदाह की घटना के बाद भी सरकार को युवाओं के विरोध का सामना करना पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। दक्षिणी जिलों में सांप्रदायिक झड़पों में तीन लोगों की मौत के बाद भी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठे।

संसद से दूरी भी बनी मुद्दा

बलेन शाह की संसद में सीमित उपस्थिति भी विवाद का कारण बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने कार्यकाल की शुरुआती 39 बैठकों में केवल पांच में हिस्सा लिया। इसके बाद संसद अध्यक्ष ने उन्हें 26 अगस्त को सदन में उपस्थित होकर सांसदों के सवालों का जवाब देने का निर्देश दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सड़क पर आंदोलन और टकराव की राजनीति ने शाह को विपक्ष में रहते हुए लोकप्रियता दिलाई, लेकिन सरकार चलाने के लिए संवाद, संस्थागत समन्वय और समझौते की क्षमता भी जरूरी है। ऐसे में Gen-Z के बदलते रुख और संसद के बढ़ते दबाव ने प्रधानमंत्री शाह के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

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