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ट्रंप का बड़ा बयान: मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील, ईरान वार्ता से जोड़ा मुद्दा

वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) की राजनीति में बड़ा बयान देते हुए कई मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते (Abraham Accords) में शामिल होने की अपील की है। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ चल रही परमाणु और शांति वार्ता के सफल होने पर क्षेत्रीय देशों को इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन जैसे देशों को इस समझौते का हिस्सा बनने का सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि यदि ये देश ईरान समझौते का हिस्सा बनना चाहते हैं तो उन्हें अब्राहम समझौते में शामिल होना चाहिए।

अब्राहम समझौता वर्ष 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में शुरू हुआ एक कूटनीतिक समझौता है, जिसका उद्देश्य इज़राइल और कई अरब देशों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित करना था। इस समझौते में अब तक यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे देश शामिल हो चुके हैं।

ट्रंप के अनुसार, यदि क्षेत्र के अधिक देश इस समझौते में शामिल होते हैं, तो इससे पश्चिम एशिया में शांति, आर्थिक सहयोग और स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान के साथ बातचीत “सकारात्मक दिशा” में आगे बढ़ रही है, हालांकि अभी तक किसी अंतिम समझौते की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर कई देशों में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ देशों ने इसे आंतरिक राजनीति और क्षेत्रीय संवेदनशीलता से जुड़ा मामला बताते हुए सतर्क रुख अपनाया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान पश्चिम एशिया की कूटनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है, लेकिन इसके व्यावहारिक परिणाम कई देशों के राजनीतिक और क्षेत्रीय हितों पर निर्भर करेंगे।

इस बीच अमेरिकी विदेश विभाग ने उम्मीद जताई है कि बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है और किसी बड़े संघर्ष को टाला जा सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार हो रहे इन सैन्य हमलों से क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ सकती है।

उधर, खाड़ी क्षेत्र में पहले से ही तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है, जहां रणनीतिक जलमार्गों और सैन्य ठिकानों को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है।

विश्लेषकों के मुताबिक अगर कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते हैं, तो यह संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है, जिससे पूरे मध्य-पूर्व की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।

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