नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के मामलों में परिवारों और समाज की चुप्पी पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा की शिकायतों को ‘समझौते’ के नाम पर दबाना एक खतरनाक सामाजिक विफलता है, जो कई बार महिलाओं की जान तक ले लेती है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने पत्नी की हत्या और घरेलू क्रूरता से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत ने पति की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि पीड़िता ने कई बार अपने परिवार और रिश्तेदारों से पति की हिंसा और दहेज प्रताड़ना की शिकायत की थी, लेकिन हर बार उसे समझौते के नाम पर वापस ससुराल भेज दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परिवार और गांव के बुजुर्गों ने यह मान लिया कि समय के साथ स्थिति सुधर जाएगी, लेकिन यह ‘झूठी उम्मीद’ अंततः पीड़िता की मौत का कारण बन गई। अदालत ने स्पष्ट कहा कि घरेलू हिंसा के मामलों में समझौते का दबाव बनाना महिलाओं की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।
पीठ ने कहा कि समाज को यह समझना होगा कि घरेलू हिंसा कोई निजी पारिवारिक मामला नहीं, बल्कि गंभीर अपराध है। अदालत ने उम्मीद जताई कि यह मामला समाज के लिए “आंखें खोलने वाला” साबित होगा और लोग ऐसी घटनाओं को हल्के में लेना बंद करेंगे।
सुनवाई के दौरान आरोपी पति ने मामले को आत्महत्या साबित करने की कोशिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराते हुए उसकी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि लगातार प्रताड़ना और हिंसा के संकेतों को नजरअंदाज करना समाज की बड़ी चूक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के मामलों में समाज की सोच बदलने की दिशा में अहम संदेश है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े मामलों में समझौते की संस्कृति को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।





