देहरादून। उत्तराखंड में प्रशासनिक पारदर्शिता को मजबूत करने की दिशा में राज्य सूचना आयोग ने एक अहम फैसला सुनाया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी पर भ्रष्टाचार के आरोप या शिकायतें हैं, तो उनसे संबंधित जानकारी सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत प्राप्त की जा सकती है।
राज्य सूचना आयोग के इस आदेश को प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आयोग ने कहा कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को व्यक्तिगत सूचना बताकर छिपाया नहीं जा सकता, क्योंकि यह सीधे तौर पर सार्वजनिक हित और शासन की पारदर्शिता से जुड़ा विषय है।
मामला उस आरटीआई आवेदन से जुड़ा था जिसमें एक आईएएस अधिकारी के खिलाफ दर्ज शिकायतों और विभागीय कार्रवाई की जानकारी मांगी गई थी। संबंधित विभाग ने सूचना देने से इनकार करते हुए इसे व्यक्तिगत जानकारी बताया था। हालांकि, सूचना आयोग ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सार्वजनिक पद पर कार्यरत अधिकारियों की कार्यप्रणाली और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी आरोप सार्वजनिक जांच के दायरे में आते हैं।
आयोग ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी अधिकारियों से जुड़ी भ्रष्टाचार संबंधी जानकारी जनता के जानने के अधिकार का हिस्सा है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है और सूचना छिपाना आरटीआई की मूल भावना के विपरीत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से शासन व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ेगी और आम नागरिकों को भ्रष्टाचार के मामलों में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार और मजबूत होगा। साथ ही सरकारी विभागों को भी सूचना उपलब्ध कराने के मामलों में अधिक सतर्क रहना होगा।
सूचना आयोग के इस निर्णय को राज्य में सुशासन और पारदर्शी प्रशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक निगरानी और प्रभावी हो सकेगी।





