वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा से जुड़े उस प्रतिबंध को एक साल के लिए और बढ़ा दिया है, जिसके तहत कुछ विदेशी पेशेवरों के लिए अमेरिका में प्रवेश से पहले 1 लाख डॉलर का भुगतान आवश्यक किया गया है। नई घोषणा के बाद यह व्यवस्था अब 21 सितंबर 2027 तक प्रभावी रहने वाली है।
H-1B वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को रोजगार देती हैं। इस कार्यक्रम का इस्तेमाल तकनीकी क्षेत्र समेत कई उद्योगों में होता है। भारत H-1B लाभार्थियों का सबसे बड़ा स्रोत है, इसलिए इस नीति का भारतीय पेशेवरों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों पर विशेष प्रभाव पड़ सकता है।
हर H-1B धारक पर लागू नहीं
अमेरिकी प्रशासन की घोषणा के अनुसार 1 लाख डॉलर का भुगतान हर H-1B वीजा धारक पर लागू नहीं है। मुख्य रूप से अमेरिका से बाहर मौजूद ऐसे विदेशी कर्मचारियों पर यह शर्त लागू होती है, जिनकी H-1B याचिका इस प्रतिबंध के दायरे में आती है। राष्ट्रीय हित में अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग कुछ मामलों में छूट देने का अधिकार भी रखता है।
अदालत में मामला लंबित
इस शुल्क को लेकर अमेरिकी अदालतों में कानूनी चुनौती भी चल रही है। जून 2026 में मैसाचुसेट्स की एक संघीय अदालत ने 1 लाख डॉलर के भुगतान की व्यवस्था को लागू करने वाले सरकारी कदम को निरस्त कर दिया था। इसके बाद सरकार ने अपील की। ऐसे में नई घोषणा के बावजूद शुल्क की वास्तविक वसूली की स्थिति न्यायिक प्रक्रिया से प्रभावित हो सकती है।
कंपनियों की जांच भी होगी
नई व्यवस्था के साथ अमेरिकी प्रशासन ने H-1B आवेदन की जांच में नियोक्ताओं द्वारा हाल में की गई या प्रस्तावित छंटनी को भी ध्यान में रखने का निर्देश दिया है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना और H-1B कार्यक्रम के कथित दुरुपयोग को रोकना है।
भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए इस नीति का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि H-1B कार्यक्रम में भारत से बड़ी संख्या में कर्मचारी शामिल होते हैं। हालांकि, शुल्क की मौजूदा कानूनी स्थिति और भविष्य के न्यायिक फैसलों के कारण इसके वास्तविक प्रभाव को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।





