नई दिल्ली। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध के बीच सरकार ने इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने के संकेत दिए हैं। सरकार का मानना है कि जेपीसी के जरिए विधेयक के प्रावधानों पर व्यापक चर्चा और विभिन्न पक्षों से सुझाव लिए जा सकते हैं। हालांकि, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और डीएमके समेत विपक्षी दल विधेयक को मौजूदा स्वरूप में पूरी तरह वापस लेने की मांग पर कायम हैं।
एफसीआरए संशोधन विधेयक लोकसभा में 25 मार्च 2026 को पेश किया गया था। प्रस्तावित कानून में विदेशी चंदे और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की गतिविधियों पर सरकारी निगरानी बढ़ाने के प्रावधान हैं। विधेयक में विदेशी अंशदान के इस्तेमाल को लेकर अतिरिक्त प्रतिबंधों का भी प्रस्ताव है, जिसमें धार्मिक मतांतरण के लिए ऐसे धन के इस्तेमाल पर रोक शामिल है।
विधेयक को लेकर कांग्रेस और टीएमसी ने सरकार से इसे वापस लेने की मांग की है। डीएमके समेत कई अन्य दलों ने भी इसके प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। कुछ विपक्षी दलों ने हालांकि पूरी तरह वापसी के बजाय विधेयक को जेपीसी के पास भेजकर विस्तृत समीक्षा कराने की मांग की है। एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने भी विधेयक वापस लेने या जेपीसी को भेजने का विकल्प सुझाया है।
इस बीच, तमिलनाडु विधानसभा ने भी 11 अगस्त को एफसीआरए संशोधन विधेयक को मौजूदा स्वरूप में वापस लेने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया। ईसाई संगठनों और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों की ओर से भी विधेयक के प्रावधानों पर चिंता जताई गई है।
सरकार की ओर से संकेत है कि विधेयक को जेपीसी में भेजने से पहले विपक्षी दलों के बीच सहमति बनाने का प्रयास किया जा रहा है। माना जा रहा है कि संसद के मौजूदा मानसून सत्र में विधेयक पर चर्चा की संभावना कम है। यदि सहमति बनती है तो इसे आगे की विस्तृत जांच के लिए दोनों सदनों की संयुक्त समिति को सौंपा जा सकता है।





